जीवन और परमेश्वर के बारे में सवालों का पता लगाने के लिए एक सुरक्षित जगह
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क्या परमेश्वर है ?

क्या परमेश्वर है ? यहाँ छः ऐसे कारण दिए जा रहे हैं जो यह विश्वास दिलाते कि ईश्वर है ।

मेरिलिन एडमसन द्वारा

क्या एक बार आप उसे जानना नहीं चाहेंगे जो आपको ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण दे सके। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि मैंने जो कुछ भी कहा है उसपर आपको विश्वास करना ही होगा। यहाँ कुछ ऐसे कारणों को देने का प्रयास किया जा रहा है जो यह दर्शाता है कि ईश्वर है। सर्वप्रथम इस पर गौर कीजिए कि जब बात ईश्वर के अस्तित्व की आती है तब बाइबल कहती है कि कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर के अस्तित्व के पर्याप्त प्रमाण मिले पर उन्होंने ईश्वर की सच्चाइयों को लोगों से छिपा कर रखा इसलिये कि ,‘‘परमेश्वर के विषय का ज्ञान उन के मनों में प्रगट है, क्योंकि परमेश्वर ने उन पर प्रगट किया है।‘’1 दूसरी तरफ वे लोग हैं जो ईश्वर को ढूँढने का प्रयास करेंगे ,’’तुम मुझे ढूंढ़ोगे और पाओगे भी ; क्योंकि तुम अपने सम्पूर्ण मन से मेरे पास आओगे।’’2

ईश्वर के अस्तित्व के विषय में जानने से पहले जो तथ्य हमारे चारों तरफ हैं उन्हें सामने रखकर हमें अपनेआप से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि यदि ईश्वर सच में हैं तो क्या हम उन्हें जानना चाहेंगे। यदि हाँ तो कुछ ऐसे कारण हैं जिनपर ध्यान दीजिए ---

1. क्या परमेश्वर है ? हमारे ग्रह की जटिलता इस ओर इशारा करती है कि इसको सोचसमझकरबनानेवाले रचयिता ने न केवल इसकी रचना की बल्कि आजतक बचाकर इसे सुरक्षित भी रखा है ।

कई उदाहरण दिखा रहे हैं कि ईश्वर ने हमें जो प्रकृति की योजना दी है संभवतः उसका अंत नही है।

धरती — इसका आकार बिल्कुल सही है। पृथ्वी के आकार और गुरुत्वाकर्षण के कारण नाइट्रोजन और आक्सीजन गैस की पतली परत 50 मील तक धरती की सतह पर फैली रहती है। अगर धरती छोटी होती तो उसके ऊपर मंगल ग्रह की तरह गैस का वातावरण बनाकर रखना असंभव होता। अगर धरती बडी होती तो उसके वातावरण मॆं बृहस्पति ग्रह की तरह हाइड्रोजन मुफ्त में बढ़ जाती।3 केवल पृथ्वी ही ऐसा जाना माना ग्रह है जिसका वातावरण सही गैसों के मिश्रण से सुसज्जित है और जिसके कारण वनस्पति,पशु तथा मानव जीवन सुरक्षित है।

-सूर्य से धरती की दूरी भी बिल्कुल सही है। मोटेतौर पर तापमान -30० से +120० तक बदलता रहता है।अगर धरती सूर्य से और अधिक दूरी पर होती तो सबकुछ बर्फ की तरह जम जाता। अगर धरती सूर्य केऔर करीब होती तो सबकुछ गर्मी से जल जाता। सूर्य से धरती की स्थिति यदि जरा सी भी भिन्न होती तो धरती पर जीवन संभव नहीं होता। धरती सूर्य से सही दूरी पर रहते हुए 67 ,000 मील प्रति घंटे की रफ्तार से उसके चारों ओर घूमती है। पृथ्वी अपनी धूरी पर घूमते हुए पूरी धरती को प्रतिदिन सही गर्मी और ठंडक देती है, पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण चन्द्रमा का आकार और दूरी सही बनी रहती है। चन्द्रमा की गति के कारण समुद्र में हलचल होती है और ज्वारभाटे आते हैं। इससे समुद्रका पानी एक जगह रुकता नहीं और न ही छलककर महाद्वीपों को डुबोता है।4

जल — गंधहीन और स्वादहीन पदार्थ होने के भी जीवित प्राणी इसके बिना नही रह सकता है। वनस्पति, पशु और मानव शरीर में पानी की मात्रा ही अधिक होती है (मानव शरीर का लगभग दो तिहाई हिस्सा उपयोगी होती पानी है) देखिए जल की विशेषताएँ किस तरह जीवन के लिए हैं।

पानी का एक असाधारण उच्च उबलता बिन्दु तथा हिमांक है। लगभग दो तिहाई पानी हमारे शरीर में 98.6 डिग्री का स्थिर तापमान बनाए रखता है जिससे कारण हम बढने घटनेवाले तापमान के वातावरण में रह सकते हैं।

-पानी तनाव की एक अनूठी सतह है। अतः पेड़ पौधों में पानी गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध ऊपर जाता है। बहुत लम्बे और ऊँचे पेड़ों में पोषक तत्व और जीवनदायिनी जल देने के लिए पानी बहुत ऊपर तक जाता है।

पानी ऊपर की तरफ जमता है र्और सतह पर तैरता रहता है ताकि जाड़ों में मछलियाँ पानी में रह सकें। पूरे जल का 97 प्रतिशत जल समुद्र मॆं है। हमारी धरती पर एक ऐसी पद्धति बनी हुई है जो पानी से नमक को अलग करती है। उसके बाद पानी को दुनिया में वितरित कर देती है। नमक को अलग कर वाष्पीकरण के द्वारा समुद्र का पानी बादल में बदल दिया जाता है और वनस्पति , पशु और मानव के लिए हवा के द्वारा पूरी भूमि पर वितरित कर दिया जाता है। यह शुद्धिकरण की प्रणाली और ग्रह पर जीवन बनाए रखने की आपूर्ति है।यह पुनर्नवीनीकरण और पुनःउपयोग पानी की प्रणाली है।6

मानव मस्तिष्क — यह एक साथ कई आश्चर्यजनक जानकारियों की प्रक्रिया करता है। हम जो भी रंग या वस्तु देखते हैं ,हमारे चारों ओर का तापमान, धरती पर हमारे पैरों का दबाव, हमारे चारों तरफ की आवाजें, हमारे मुँह का सूखापन, यहाँ तक कि हमारे कीबोर्ड की बनावट, हमारा मस्तिष्क इन सभी को ग्रहण करता है। हमारा मस्तिष्क हमारी भावनाओं, विचारों और स्मृतियों को धारण करता है और उसके अनुरूप प्रतिक्रिया करता है। इसके साथ-साथ यह हमारी शारीरिक क्रियाओं का भी ध्यान रखता है जैसे – हमारे श्वास लेने का प्रतिरूप, पलकों का झपकना, भूख, हमारे हाथों की माँसपेशियों की हरकत।

-मानव मस्तिष्क एक सेकेन्ड में लाखों संदेश भेजता है।7 यह अनावश्यक संदेशों मे से आवश्यक संदेश छाँट लेता है। जाँच का यह कार्य हमें प्रभावी तरीके से अपने आपको संचालित कर संसार में काम करने की अनुमति देता है। बाकी अंगों की अपेक्षा मस्तिष्क अलग ढंग से काम करता है। इसमें बुद्धिमता, तार्किक क्षमता, भावना पैदा करना, सोचकर योजना बनाना, कारवाई करना, दूसरे लोगों से संबंध बनाना आदि सम्मिलित हैं।

आँख — यह सात लाख रंगों में भेद कर सकती है। यह स्वचालित ध्यान को केंद्रित करती है, फिर भी विकास पूरी तरह इस बात को नहीं समझा पाता कि आँख या मस्तिष्क की शुरुआत या निर्जीव पदार्थ से जीवित प्राणी की शुरुआत कैसे हुई।

2. क्या ईश्वर है ? यह ब्रह्मांड कैसे शुरु हुआ ---? उसका क्या कारण है ?

-वैज्ञानिक इस बात से सहमत हैं कि हमारा ब्रह्मांड प्रचंड ऊर्जा और प्रकाश के विस्फोट से बना है जिसे बिग बैंग कहते हैं। खगोलशास्त्री रॉबर्ट जेस्ट्रो स्वयंवर्णित अज्ञेयवादी, ने बताया ‘’ब्रह्मांड में जो कुछ भी हुआ उन सबका बीज पहली बार में ही बोया गया ; ब्रह्मांड का हर तारा, हर ग्रह, हर जीवित प्राणी हर उन घटनाओं के कारण अस्तित्व में आ गया जो ब्रह्मांडीय विस्फोट के क्षण गति में आई। ----- ब्रह्मांड भी इसी तरह अस्तित्व में आया पर हम यह नहीं बता सकते कि ऐसा होने का क्या कारण था। ‘’9

स्टीवेन विनबर्ग भौतिक विज्ञान के नोबल पुरस्कार विजेता ने इस विस्फोट के समय कहा ‘’ब्रह्मांड लगभग एक सौ हजार करोड़ डिग्री सेन्टीग्रेट -----और ब्रह्मांड प्रकाश से भरा था। ‘’10 ब्रह्मांड हमेशा से अस्तित्व में नहीं था। उसकी शुरुआत हुई ---- उसके होने का क्या कारण था ? वैज्ञानिकों के पास अचानक प्रकाश और पदार्थ के विस्फोट होने का कोई स्पष्टीकरण नहीं है।

3. क्या परमेश्वर हैं ? ब्रह्मांड प्रकृति के समरूप नियमों द्वारा संचालित होता है। ऐसा क्यों होता है ?

जीवन ज्यादातर अनिश्चित लगता है, पर देखिए हम दिन प्रतिदिन क्या देख सकते हैं : गुरुत्वाकर्षण अपरिवर्तनशील रहता है, कॉफी के गर्म प्याले को यदि मेज पर छोड़ दिया जाय तो वह ठंडा हो जाता है, पृथ्वी उसी चौबीस घंटे में अपनी परिक्रमा पूरी करती है और प्रकाश की गति नहीं बदलती - धरती पर या ऐसी आकाशगंगाओं पर, जो हमसे दूर हैं। ऐसा कैसे होता है कि हम प्रकृति के नियमों को पहचानते हैं जो कभी नहीं बदलते ? ब्रह्मांड इतना विश्वसनीय और इतना व्यवस्थित क्यों है ? ‘’

-‘’बड़े –बड़े वैज्ञानिक यह सोचकर आवाक् रह गए कि यह कितना विचित्र है। किसी भी ब्रह्मांड की यह तार्किक आवश्यकता नहीं है कि वह नियमों का पालन करे। यही अकेला है जो गणित के नियमों का पालन करता है। ऐसी मान्यता कि ब्रह्मांड को इस तरह का व्यवहार करने की जरूरत नहीं है, आश्चर्य का कारण है। एक ऐसे ब्रह्मांड की कल्पना करना आसान है जिसमें हर क्षण स्थितियाँ अनिश्चित रूप से बदलती रहती हैं,या ऐसा ब्रह्मांड जिसमें चीजें अस्तित्व के भीतर और बाहर होती रहती हैं ‘’11

रिचर्ड फेनमन, क्वान्टम इलेक्ट्रोडाइनमिक्स के नोबल पुरस्कार विजेता ने कहा ,‘’ प्रकृति गणित की तरह क्यों है, यह एक रहस्य है -- यह तथ्य कि यहाँ नियम हैं एक तरह का चमत्कार है।‘’12

4. क्या परमेश्वर हैं ? डीएनए कोड कोशिकाओं के व्यवहार के कार्यक्रम को बताता है।

-सभी तरह के निर्देश ,शिक्षण और प्रशिक्षण किसी आशय से आते हैं। कोई भी किसी उद्देश्य से निर्देश पुस्तिका लिखता है। क्या आप जानते हैं कि हमारे शरीर की हर कोशिका में एक विस्तृत अनुदेश कोड होता है जो एक लघु कम्प्यूटर कार्यक्रम की तरह होता है। जैसा कि हम जानते हैं, एक कम्प्यूटर कार्यक्रम एक (1) और शून्य (0) से बनता है, जैसे 110010101011000 ये इस तरह के क्रम में सज्जित होते हैं कि ये कंप्यूटर के कार्यक्रम को क्या करना है बताते रहते हैं । डीएनए कोड हर कोशिका में लगभग एक जैसा होता है। वैज्ञानिक संक्षिप्त रूप में यह बताते हैं कि यह चार तरह के रसायनों से बना होता है – ए , टी, जी और सी । ये मानव कोशिका में इस क्रम में सज्जित रहते हैं : सी जी टी जी टी जी ए सी टी सी जी सी टी सी सी टी जी ए टी, हर मानव कोशिका में ऐसे तीन अरब अक्षर पाए जाते हैं !!

जिस तरह खास कारण के लिए हम अपने फोन में बीप का कार्यक्रम निश्चित करते हैं उसी तरह डीएनए कोड कोशिकाओं को निर्देश देता है। डीएनए तीन अरब अक्षरों का कार्यक्रम है जो कोशिकाओं को एक खास तरीके से काम करने का निर्देश देता है। यह एक पूरी निर्देश पुस्तिका है।13

-यह इतना आश्चर्यजनक क्यों है ? कोई पूछे --- यह जानकारी का कार्यक्रम हर मानव कोशिका में कैसे आया, यह केवल रसायन नहीं है। ये ऐसे रसायन हैं जो विस्तृत तरीके से निर्देश देते हैं कि किस तरह मानव शरीर का विकास हो।

प्राकृतिक और जैविक कारण कार्यान्वित जानकारी का स्पष्टीकरण नहीं दे सकते। जबतक कोई जानबूझकर इसे न बनाए ऐसे निर्देश,ऐसी जानकारी का मिलना नामुमकिन है।

5. क्या परमेश्वर हैं ? हम जानते हैं कि परमेश्वर है क्योंकि वह हमें इसके लिए बाध्य करता है, निरन्तर प्रेरणा दे रहा है और ढूँढ रहा है।

एक समय मैं नास्तिक था। बहुत से नास्तिकों की तरह, वैसे लोगों का मुद्दा जो परमेश्वर में विश्वास करते थे, मुझे बहुत परेशान करता था। नास्तिकों का क्या,हम बहुत समय, ध्यान और ऊर्जा इस बात का खंडन करने में बिताते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है। हमारे ऐसा करने का क्या कारण है ? जब मैं एक नास्तिक था, मैने अपने इरादों को जिम्मेदारी से उन गरीब, भ्रांतिमय लोगों की देखभाल में लगाया ताकि उनको यह एहसास कराने में मदद कर सकूँ कि उनकी आशा पूरी तरह व्यर्थ है। ईमानदारी से बताऊँ, मेरी एक दूसरी इच्छा भी थी । जो ईश्वर पर विश्वास करते थे, जब मैंने उन्हें ललकारा तब मैं दिल से यह देखने के लिए इच्छुक था कि क्या वे मुझे ईश्वर में यकीन दिला सकेंगे। मेरी खोज का एक अंश यह भी था कि मैं ईश्वर जैसे प्रश्न से मुक्त हो सकूँ। अगर मेरा निर्णय ईश्वर को माननेवालों को गलत सिद्ध कर देता तो सारा मामला ही सुलझ जाता और मैं अपने जीवन को कहीं भी ले जाने के लिए मुक्त हो जाता ।

-मैंने यह कारण महसूस नहीं किया कि ईश्वर का विषय मेरे दिमाग पर बहुत बोझ डाल रहा है क्योंकि ईश्वर खुद इस मुद्दे पर दबाव डाल रहा था। ईश्वर खुद चाहता था कि लोग उसे जाने। उसने हमे उसे जानने के इरादे के साथ पैदा किया। उसने हमारे चारों तरफ अपने होने के सबूत छोड़े और हमारे सामने अपने अस्तित्व के प्रश्न पैदा किए। शायद इसीलिए मैं ईश्वर के होने की संभावना जैसे प्रश्न को सोचने से बच नहीं पा रहा था। वास्तव में जिस दिन मैंने ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किया, मेरी प्रार्थना इस शब्द से शुरू हुई, ‘’ठीक है, आप जीते ---‘’ इसका अन्तर्निहित कारण यह हो सकता है कि नास्तिक उन लोगों के बारे में चिन्ता करते हैं जो ईश्वर पर विश्वास रखते हैं क्योंकि ईश्वर खुद सकारात्मक रूप से उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य करते हैं।

केवल मैं ही ऐसा नहीं हूँ जिसने इसका अनुभव किया। मेलकोलम मग्रिज,एक समाजवादी और दार्शनिक लेखक ने लिखा है, ’’खोज के अलावा, मेरी ऐसी धारणा है कि मेरा पीछा किया जा रहा है।‘’ सी एस लेविस ने कहा, उन्हे याद है,‘’ एक के बाद एक कई रातों के बाद काम से एक क्षण के लिए भी जब मेरा ध्यान हटा तो ईश्वर का स्थिर और कठोर दृष्टिकोण, जिससे जोर देकर भी मैं मिलने की इच्छा नहीं रखता था मुझे महसूस हुआ। मैंने ईश्वर को स्वीकार किया और यह माना कि ईश्वर ईश्वर है, घुटनों पर बैठकर प्रार्थना की शायद उस रात वह पूरे इंगलैंड का सबसे उदास और अनिच्छुक धर्मांतरण था।'’

ईश्वर को जानने के बाद लेविस ने एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक था ,‘’सरप्राइज्ड बाइ जॉय‘’ परमेश्वर के अस्तित्व को हक से स्वीकारने के अलावा मुझे और कोई उम्मीद न थी। फिर भी आनेवाले कई महीनों में, मैं अपने लिए ईश्वर का प्रेम देखकर चकित रह गया।

6. क्या परमेश्वर है ? ईश्वर के दूसरे रहस्योद्घाटनों के विपरीत , जीसस क्राइस्ट (ईसा मसीह ) ईश्वर की सबसे विशिष्ट और स्पष्ट तस्वीर है जो अपने रहस्योद्घाटन हमारे सामने करती है।

यीशु ही क्यों पूरे संसार के महान धर्मों पर एक दृष्टि डालिए और आप देखेंगे बुद्ध, मोहम्मद, कनफ्यूसियस और मोसेस ( मूसा ) उन सभी ने अपनी पहचान एक शिक्षक या मसीहा के रूप में कराई। उनमें से किसी ने भी प्रभु के बराबर होने का दावा नहीं किया। आश्चर्यजनक रूप से यह केवल यीशु ने किया। इसी बात ने यीशु को सबसे अलग स्तर में लाकर खड़ा कर दिया है। यीशु ने कहा ,’’ईश्वर है और हम उसे देख सकते हैं।‘’ उन्होंने अपने परमपिता की बात की जो स्वर्ग में हैं, यह अलगाव की स्थिति के कारण नहीं बल्कि अंतरंग मिलाप के कारण जो पूरी मानवता के लिए अद्वितीय है । यीशु ने कहा,’’जिसने भी उन्हें देखा है, उसने परम पिता को देखा है, जिसने भी उनपर विश्वास किया, उसने परम पिता पर विश्वास किया।‘’ उन्होंने कहा, ’’ जगत की ज्योति मैं हूं; जो मेरे पीछे हो लेगा, वह अन्धकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा।‘’14 उन्होंने केवल प्रभु से संबंधित विशेषताओं का दावा किया लोगों को उनके पापों के लिए क्षमा कर सकने की समर्थता,पाप करने की प्रवृत्ति से मुक्त कराना, लोगों को प्रचुर मात्रा में जीवन और स्वर्ग में उन्हें अनन्त जीवन देना। दूसरे गुरूओं के विपरीत, जो लोगों पर, उनके शब्दों के आधार पर ध्यान केंद्रित करते थे,यीशु ने लोगों का ध्यान अपनी तरफ दिलवाया। उन्होंने यह नहीं कहा , मेरे शब्दों का अनुसरण करो तब तुम्हे सच की प्राप्ति होगी ,‘’उन्होंने कहा, मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता।115

यीशु ने परमात्मा होने का दावा करने के क्या सबूत दिए ? उन्होंने वह किया जो और लोग नहीं कर सकते थे । यीशु ने चमत्कार किए। लोगों को चंगा किया --- अंधे, विकलांग, बहरे और कुछ लोगों को जो मर चुके थे, उन्हे जीवित किया। वस्तुओं पर उनका अधिकार था। उन्होंने पतली हवा से खाना बनाया जो कि कई हजार लोगों की भीड़ का पेट भरने के लिए काफी था। उन्होंने प्रकृति पर चमत्कार दिखाए व एक झील पर चलकर गए । कुछ दोस्तों के लिए एक उग्र तूफान को रुकने की आज्ञा दी। सभी जगहों से लोग यीशु के पीछे चलने लगे क्योंकि यीशु उनकी जरूरतों को पूरा करते रहे और चमत्कार करते रहे। उन्होंने कहा ,’’ अगर आप उसपर विश्वास नहीं करना चाहते हैं जो मैं कह रहा हूँ , तो कम से कम उन चमत्कारों को देखकर मुझपर विश्वास कीजिए जो आपने देखे हैं। ‘’16

-ईश्वर हमारे साथ गहरा रिश्ता रखना चाहता यीशु ने बताया कि ईश्वर सौम्य, प्रेम करनेवाला,हमारी आत्मकेन्द्रितता और हमारी कमियों को जाननेवाला है। इसके बावजूद भी वह है । यीशु ने बताया कि हालांकि ईश्वर हमें पापी मानता है जो दंड के योग्य है, फिर भी वह हमसे बहुत प्रेम करता है जिसके कारण उसने एक अलग योजना बनाई। प्रभु ने स्वयं मनुष्य का रूप लिया और हमारे पापों का दंड हमारी तरफ से खुद पर स्वीकार किया। सुनने में यह बहुत ही ऊटपटांग लगता है लेकिन, शायद बहुत से प्यार करनेवाले पिता जरूरत पड़ने पर अपने बच्चे के साथ कैंसरवार्ड में भी रहना पसंद करेंगे। बाइबल कहती है कि हम ईश्वर से इसलिए प्यार करते हैं क्योंकि पहले ईश्वर ने ही हमें प्यार किया।यीशु हमारी जगह मरे ताकि हमें माफी मिल सके। मानवता के जितने भी धर्म हैं, केवल यीशु के माध्यम से ही हम ईश्वर को उन तक पहुँचते हुए देख सकते हैं। वह हमारे लिए एक रास्ता बनाते हैं ताकि हमारा उनसे एक रिश्ता बन सके। यीशु यह सिद्ध करते हैं कि उनके शुद्ध ह्रदय में प्रेम है, वे हमारी जरूरतों को पूरा करते हैं, हमें अपनी तरफ खींचते हैं। यीशु की मृत्यु तथा उनके पुनःजी उठने के कारण, वे आज हमें एक नया जीवन प्रदान करते हैं। हमें माफी मिल सकती है, परमेश्वर के द्वारा हमें पूरी तरह अपनाया जा सकता है और हमें ईश्वर का पवित्र प्रेम मिल सकती है। वे कहते हैं,’’ मैं तुझ से सदा प्रेम रखता आया हूँ; इस कारण मैं ने तुझ पर अपनी करुणा बनाए रखी है।‘’17यह कर्मरत परमेश्वर है।

क्या परमेश्वर हैं ? अगर आप जानना चाहते हैं तो यीशु के बारे में पता लगाइए। हमें बताया गया है , ’’ परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उसपर विश्वास करे वह नाश ना हो परन्तु अनन्त जीवन पाए।'18 ईश्वर ने हमें अपने ऊपर विश्वास करने के लिए मजबूर नहीं किया, हालांकि वे चाहते तो ऐसा कर सकते थे। उन्होंने अपने अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत दिए, ताकि हम अपनी इच्छा से उसपर प्रतिक्रिया कर सकें। धरती की सूर्य से सही दूरी, जल का अद्भुत रासायनिक गुण, मानव मस्तिष्क, डीएनए, लोगों की संख्या जो प्रभु को जानने का जवाब चाहती है, हमारे ह्रदय औऱ मस्तिष्क की जिज्ञासा जो यह निश्चित करना चाहती है कि परमेश्वर है, ईश्वर को यीशु के माध्यम से जानने की इच्छा। अगर आप यीशु के बारे में और ज्यादा जानना चाहते हैं, उनपर विश्वास करने का कारण ढूँढना चाहते हैं तो देखें : बियोंड ब्लाइंड फेथ ( अंधविश्वास से परे )

अगर आप परमेश्वर के साथ अभी एक गहरा रिश्ता शुरू करना चाहते हैं तो कर सकते हैं।

यह आपका निश्चय है। इससे किसी को कोई मतलब नहीं है। पर यदि आप परमेश्वर के द्वारा माफी चाहते हैं और उसके साथ एक रिश्ता बनाना चाहते हैं, यह आप उऩसे माफी मांगकर और उन्हें अपने जीवन में आमंत्रित कर अभी तुरंत कर सकते हैं। यीशु ने कहा, ’’ देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूं; यदि कोई मेरा शब्द सुन कर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आ कर उसके साथ भोजन करूंगा, और वह मेरे साथ। ’’19 यदि आप यह करना चाहते हैं, पर निश्चय नहीं कर पा रहे हैं कि किस तरह शब्दों में कहा जाए तो यह आपकी सहायता करेगा, यीशु मेरे पापों के कारण मरने के लिए धन्यवाद। आप मेरे जीवन के विषय में जानते हैं और यह भी जानते हैं कि मुझे क्षमा चाहिए। मैं आपसे इसी समय क्षमा और अपने जीवन में आने की याचना करता हूँ। मैं आपके विषय में सच्चाई से जानना चाहता हूँ। अभी मेरे जीवन में आइए। आप मेरे साथ एक रिश्ता बनाना चाहते हैं इसके लिए धन्यवाद। आमीन

परमेश्वर आपके साथ उनके रिश्ते को स्थाई मानते हैं। जो लोग उनपर विश्वास करते हैं उऩ सबों के बारे में बताते हुए यीशु कहते ह ,” मैं उन्हें जानता हूं, और वे मेरे पीछे पीछे चलती है और मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूं, और वे कभी नाश न होंगी, और कोई उन्हें मेरे हाथ से छीन न लेगा। मेरा पिता, जिस ने उन्हें मुझ को दिया है, सब से बड़ा है, और कोई उन्हें पिता के हाथ से छीन नहीं सकता। ‘’20

इन सभी तथ्यों को देखते हुए , इस नतीजे पर पहुँचा जा सकता है कि प्रेम करनेवाले परमेश्वर का अस्तित्व है और उन्हें निजी और सूचित करनेवाले तरीके से जाना जा सकता है।

 मैंने यीशु को मेरे जीवन में आने के लिए कहा (कुछ उपयोगी जानकारी इस प्रकार है) ...
 मैंने अपने जीवन में यीशु पूछना चाहते हो सकता है, और पूरी तरह से यह समझाने कृपया ...
 मेरा एक सवाल है ...

लेखक के विषय में : पहले नास्तिक होने के कारण , मेरिलिन एडमसन के लिए उन प्रार्थनाओं का जो कि सुनी जा रही थीं और उनके एक करीबी मित्र के जीवन की उत्तमता का खंडन करना मुश्किल था। अपने मित्र के विश्वास को चुनौती देने पर , मेरिलिन को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि उनसे प्राप्त सबूत ईश्वर के अस्तित्व की ओर इशारा कर रहे थे। लगभग एक साल तक लगातार प्रश्नों के बाद मर्लिन ईश्वर के उनके जीवन में आने की पेशकश के प्रति अनुकूल हो गई। उन्हें ईश्वर पर विश्वास हो गया जो कि उनके विश्वास की निरंतर पुष्टि करता रहा और उनके लिए लाभप्रद सिद्ध हुआ।

(1) रोमियो 1:19:20 (2) यिर्मयाह 29:13:14 (3) आर.ई.डी.क्लार्कक्रिएशन(लंदनटाइडेलप्रेस1946) पी.20 (4) दवंडर्सऑफगोड्सक्रिएशन ,मूडीइन्स्टीट्यूटऑफसाइंस (शिकागो,आई.एल.) (5) आइ.बी.आइ.डी. (6) आइ.बी.आइ.डी. (7) आइ.बी.आइ.डी. (8) ह्यू डासन फिजिओलोजी ऑफ द आइ, पाँचवा संस्करण (न्यूयोर्कमैक्ग्रोहिल्स,1991) (9) रॉबर्ट जेस्ट्रो ‘’ मैसेज फ्रोम प्रोफेसर रॉबर्ट जेस्ट्रो ,’’ लीडर यू. कॉम ; 2002 (10) स्टीवन विन्बर्ग ; द फर्स्ट थ्री मिनट्स : ए मॉडर्न व्यू ऑफद ओरिजिन ऑफद युनिवर्स;(बेसिक बुक्स 1988 ); 5. पी (11) दिनेश डिसूजा वाट सो ग्रेट अबाउट क्रिस्चियानिटी ; ( रिजनरी पब्लिशिंग, आइ.एन.सी. 2007 , चैप्टर 11 ) (12) रिचर्ड फेनमन , द मीनिंग ऑफ इट ऑल : थौट्स ऑफ ए सिटिजन साइंटिस्ट ( न्यूयोर्क : बेसिक बुक्स, 1998 ), 43 (13) फ्रांसिस एस कौलिन्स , डाइरेक्टर ऑफ द ह्यूमन नोट प्रोजेक्ट , लेखक – लैंगुएज ऑफ गॉड , ( फ्री प्रेस, न्यूयॉर्क एन वाइ ) 2006 (14) यूहन्ना 8:12 (15) यूहन्ना 14:6 (16) यूहन्ना 14:11 (17) यिर्मयाह 31:3 (18) यूहन्ना 3:16 (19) प्रकाशित वाक्य 3:20 (20) यूहन्ना 10:27-29

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