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क्या परमेश्वर है ?

क्या परमेश्वर है? यहाँ छः ऐसे कारण दिए जा रहे हैं जो यह विश्वास दिलाते हैं कि परमेश्वर है ।

मेरिलिन एडमसन द्वारा लिखित

क्या एक बार आप यह नहीं चाहेंगे की आपको सरल तरीक़े से परमेश्वर के अस्तित्व का प्रमाण मिल जाए? ज़बरदस्ती, या किसी के भय में आकर नहीं, परंतु सीधा साधा प्रमाण जिस पर आप विश्वास कर ले? यहाँ, यहाँ, कुछ ऐसे कारणों को देने का प्रयास किया जा रहा है जो यह दर्शाता है कि परमेश्वर है।

सबसे पहले, इस पर विचार कीजिए- जब बात परमेश्वर के अस्तित्व की होती है, तब बाइबल कहती है कि कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर के अस्तित्व के पर्याप्त प्रमाण मिले पर उन्होंने परमेश्वर की सच्चाइयों को लोगों से छिपा कर रखा इसलिये कि, ‘‘परमेश्वर के विषय का ज्ञान उन के मनों में प्रगट है, क्योंकि परमेश्वर ने उन पर प्रगट किया है।‘’1 दूसरी तरफ वे लोग हैं जो परमेश्वर को ढूँढने का प्रयास करेंगे, “तुम मुझे ढूंढ़ोगे और पाओगे भी; क्योंकि तुम अपने सम्पूर्ण मन से मेरे पास आओगे।’’2

परमेश्वर के अस्तित्व के विषय में जानने से पहले जो तथ्य हमारे चारों तरफ हैं, उन्हें सामने रखकर हमें अपने आप से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि यदि परमेश्वर सच में हैं तो क्या हम उन्हें जानना चाहेंगे? यदि हाँ, तो कुछ ऐसे कारण हैं जिनपर ध्यान दीजिए ---

1. हमारे ग्रह की जटिलता, इस ओर इशारा करती है कि इसको बहुत सोच-समझ कर, बनाने वाले ने इसकी रचना की है। और न केवल इसकी रचना की, बल्कि आज तक बनाए भी रखा है ।

परमेश्वर की रचना के बारे में, अनंत उदाहरण दिए जा सकते हैं, परंतु हम सिर्फ़ निम्न देखेंगे-

पृथ्वी — इसका आकार बिल्कुल उत्तम/सही है। पृथ्वी के आकार और गुरुत्वाकर्षण के कारण नाइट्रोजन और आक्सीजन गैस की पतली परत 50 मील तक धरती की सतह पर फैली रहती है। अगर पृथ्वी थोड़ी भी छोटी होती तो उसके ऊपर, मंगल ग्रह की तरह, वायुमंडल बनाकर रखना असंभव होता। और अगर पृथ्वी बड़ी होती, तो उसके वातावरण मॆं, बृहस्पति ग्रह की तरह, हाइड्रोजन बढ़ जाती।3 केवल पृथ्वी ही ऐसा जाना माना ग्रह है जिसका वातावरण/वायुमंडल सही गैसों के मिश्रण से सुसज्जित है और जिसके कारण वनस्पति, पशु तथा मानव जीवन सुरक्षित है।

-सूर्य से पृथ्वी की दूरी भी बिल्कुल सही है। मोटे तौर पर, तापमान -30० से +120० तक बदलता रहता है। अगर पृथ्वी सूर्य से और अधिक दूरी पर होती, तो सबकुछ बर्फ की तरह जम जाता। अगर पृथ्वी सूर्य के और करीब होती, तो सबकुछ गर्मी से जल जाता। सूर्य से पृथ्वी की स्थिति यदि जरा सी भी भिन्न होती तो पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं होता। पृथ्वी सूर्य से सही दूरी पर रहते हुए, 67,000 मील प्रति घंटे की रफ्तार से उसके चारों ओर घूमती है। पृथ्वी अपनी धूरी पर घूमते हुए पूरी धरती को प्रतिदिन सही गर्मी और ठंडक देती है, पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण चन्द्रमा का आकार और दूरी सही बनी रहती है। चन्द्रमा की गति के कारण समुद्र में हलचल होती है और ज्वारभाटे आते हैं। इससे समुद्र का पानी एक जगह रुकता नहीं और न ही छलक कर महाद्वीपों को डुबोता है।4

जल — एक गंधहीन और स्वादहीन पदार्थ होने के बावजूद भी, कोई जीवित प्राणी पानी/जल के बिना नही रह सकता है। वनस्पति, पशु और मानव के शरीर में पानी की मात्रा सबसे अधिक होती है (मानव शरीर का लगभग दो तिहाई हिस्सा पानी है) देखिए किस तरह जल की विशेषताएँ/गुण हमारे जीवन के लिए उपयुत हैं।

जल के उबलने और जम जाने के तापमान के बीच काफ़ी बड़ी सीमा है। लगभग दो तिहाई पानी, हमारे शरीर में 98.6 डिग्री का स्थिर तापमान बनाए रखता है, जिसके कारण हम बढ़ने/घटनेवाले तापमान के वातावरण में भी ठीक ठाक रह सकते हैं।

-जल/पानी एक सार्वभौमिक विलायक (घुलानेवाला- यूनिवर्सल सॉल्वेंट) है। इस गुण का मतलब है की जल अनेक आवश्यक रसायन, खनिज और पोषक तत्व हमारे शरीर में हर जगह पहुँचाता हैं, छोटी से छोटी रक्त वाहिकाओ में भी।5

पानी की सतह में एक अनूठा तनाव है। अतः पेड़-पौधों में पानी गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध ऊपर जाता है, यहाँ तक की लम्बे और ऊँचे पेड़ों में भी पोषक तत्व और जीवन देने वाला जल बहुत ऊपर तक जाता है।

पानी ऊपर से नीचे की तरफ़ जमता है और सतह पर तैरता रहता है ताकि जाड़ों में मछलियाँ पानी में रह सकें।

-इस पृथ्वी का 97 प्रतिशत जल समुद्र मॆं है। परंतु हमारी धरती पर, एक ऐसी प्रणाली बनी हुई है जो पानी से नमक को अलग करती है और फिर पानी को दुनिया में वितरित कर देती है। भाप बनकर उड़ने की क्रिया (वाष्पीकरण- इवैपोरेशन) के द्वारा, नमक को अलग कर के, समुद्र का पानी बादल में बदल जाता है और वनस्पति, पशु और मानव के लिए हवा के द्वारा पूरी भूमि पर वितरित कर दिया जाता है। यह एक शुद्धिकरण और आपूर्ति की प्रणाली है जो की हमारे ग्रह पर जीवन बनाए रखती है - एक पुनर्नवीनीकरण और पुनःउपयोग पानी की प्रणाली।6

मानव मस्तिष्क — यह एक-साथ कई आश्चर्यजनक जानकारियों की प्रक्रिया करता है। हम जो भी रंग या वस्तुऐं देखते हैं, हमारे चारों ओर का तापमान, धरती पर हमारे पैरों का दबाव, हमारे चारों तरफ की आवाजें, हमारे मुँह का सूखापन, हमारा मस्तिष्क/दिमाग़ इन सभी को ग्रहण करता है और हमारी भावनाओं, विचारों और स्मृतियों को धारण कर उनपर प्रक्रिया करता है। इसके साथ-साथ यह हमारी शारीरिक क्रियाओं का भी ध्यान रखता है जैसे कि – हमारे श्वास लेने का प्रतिरूप, पलकों का झपकना, भूख, हमारे हाथों की माँसपेशियों की हरकत, आदि।

-मानव मस्तिष्क एक सेकेन्ड में लाखों संदेश भेजता है।7 यह अनावश्यक संदेशों मे से आवश्यक संदेश छाँट लेता है। जाँच का यह कार्य हमें प्रभावी तरीके से अपने आपको संचालित कर, संसार में काम करने की अनुमति देता है। बाकी अंगों की अपेक्षा, मस्तिष्क अलग ढंग से काम करता है। इसमें बुद्धिमता, तार्किक क्षमता, भावना पैदा करना, सोचकर योजना बनाना, कारवाई करना, दूसरे लोगों से संबंध बनाना आदि सम्मिलित हैं।

आँख — यह सात लाख रंगों में भेद कर सकती है। यह स्वचालित ध्यान को केंद्रित करती है, और हर दिन क़रीब 15 लाख संदेशों को सम्भालती है - एक ही समय पर! उद्भव/क्रमागत उन्नति (इवोलूशन) जीवों के अंदर हो रहे उत्परिवर्तन और परिवर्तन की ओर केंद्रित होता है। फिर भी क्रमागत उन्नति (इवोलूशन) पूरी तरह इस बात को नहीं समझा पाता कि आँख या मस्तिष्क की शुरुआत, या निर्जीव पदार्थ से जीवित प्राणी की शुरुआत कैसे हुई।

2. इस ब्रह्मांड की शुरुआत हुई… पर कैसे ?

-वैज्ञानिक इस बात से आश्वस्त हैं कि हमारा ब्रह्मांड, एक प्रचंड/विशाल ऊर्जा और प्रकाश के विस्फोट से बना है, जिसे को ‘बिग बैंग’ या ‘महाविस्फोट सिद्धांत’ कहते हैं- कि इस एक शुरुआत से सब कुछ जीवित है: ब्रह्मांड की शुरुआत, अंतरिक्ष की शुरुआत, और यहाँ तक की समय की भी शुरुआत!

खगोल-भौतिकविज्ञानिक रॉबर्ट जेस्ट्रो, जो की अपने आप को अज्ञेयवाद का अनुयायी (ऐग्नास्टिक) मानते हैं, ने बताया कि, “ब्रह्मांड में जो कुछ भी हुआ, उन सबका बीज उस पहली शुरुआत में ही बोया गया; ब्रह्मांड का हर तारा, हर ग्रह, हर जीवित प्राणी, उस घटना के कारण अस्तित्व में आ गया जब ब्रह्मांडीय महाविस्फोट हुआ… ब्रह्मांड भी इसी तरह अस्तित्व में आया, पर हम यह नहीं बता सकते कि ऐसा होने का क्या कारण था।”9

स्टीवेन वाईनबर्ग, जो की एक नोबल पुरस्कार विजेता और भौतिक विज्ञानिक हैं, ने कहा, कि इस विस्फोट के समय “ब्रह्मांड लगभग सौ हजार करोड़ डिग्री सेन्टीग्रेट तापमान पर था…और ब्रह्मांड प्रकाश से भरा था।”10

ब्रह्मांड हमेशा से अस्तित्व में नहीं था। उसकी शुरुआत हुई…पर उसका क्या कारण था? वैज्ञानिकों के पास अचानक प्रकाश और पदार्थ के विस्फोट होने का कोई स्पष्टीकरण नहीं है।

3. ब्रह्मांड, प्रकृति के समरूप नियमों द्वारा संचालित होता है। ऐसा क्यों होता है ?

जीवन, ज़्यादातर, अनिश्चित लगता है, पर देखिए हम दिन प्रतिदिन की किन चीज़ों के अवश्य होने पर भरोसा कर सकते हैं: गुरुत्वाकर्षण अपरिवर्तनशील रहता है, कॉफी के गर्म प्याले को यदि मेज पर छोड़ दिया जाय तो वह ठंडा हो जाता है, पृथ्वी उसी चौबीस घंटे में अपनी परिक्रमा पूरी करती है और धरती पर, या ऐसी अनेक आकाशगंगाओं पर, जो हमसे दूर हैं, प्रकाश की गति नहीं बदलती।

-ऐसा कैसे होता है कि हम इन प्रकृति के नियमों को पहचान लेते हैं, जो कभी नहीं बदलते? ब्रह्मांड इतना विश्वसनीय और इतना व्यवस्थित क्यों है?

“बड़े –बड़े वैज्ञानिक यह सोचकर आवाक् रह गए कि यह कितना विचित्र है। किसी भी ब्रह्मांड की यह तार्किक आवश्यकता नहीं है कि वह नियमों का पालन करे, और जो ब्रह्मांड गणित के नियमों का पालन करे, बिलकुल नहीं! इस आश्चर्य और अचम्भे का कारण इस मान्यता का नतीजा है कि- ब्रह्मांड को इस तरह का व्यवहार करने की जरूरत नहीं है। एक ऐसे ब्रह्मांड की कल्पना करना ज़्यादा आसान है जिसमें हर क्षण स्थितियाँ अनिश्चित रूप से बदलती रहती हैं, या ऐसा ब्रह्मांड जिसमें चीजें अस्तित्व में आती या जाती रहती हैं”11

रिचर्ड फेनमन, जो कि प्रमात्रा विद्युतगतिकी (क्वान्टम इलेक्ट्रोडाइनमिक्स) के नोबल पुरस्कार विजेता हैं, ने कहा, “प्रकृति गणित की तरह क्यों है, यह एक रहस्य है… यह तथ्य कि इसमें नियम हैं, यह अपने आप में ही एक तरह का चमत्कार है।‘’12

4. डी एन ए कोड बताता है, कोशिकाओं के व्यवहार को बनाता है

-सभी तरह के निर्देश, शिक्षण और प्रशिक्षण किसी आशय/इरादे से आते हैं। जब कोई निर्देश पुस्तिका लिखता है, उसका भी कोई उद्देश्य होता है। क्या आप जानते हैं कि हमारे शरीर की हर कोशिका में एक विस्तृत अनुदेश कोड होता है, जो एक लघु/छोटे कम्प्यूटर कार्यक्रम की तरह होता है। जैसा कि हम जानते हैं, एक कम्प्यूटर कार्यक्रम एक (1) और शून्य (0) से बनता है, जैसे कि: 110010101011000 – ये जब इस तरह के क्रम में होते हैं, तो ये कम्प्यूटर के कार्यक्रम को क्या करना है, बताते रहते हैं । हमारी कोशिकाओं में डी एन ए इसी के समान होता है। यह चार तरह के रसायनों से बना होता है, जिसे वैज्ञानिक संक्षिप्त रूप में ऐसे बताते हैं – ए, टी, जी, सी. (A, T, G, C) । ये मानव कोशिका में इस क्रम में सज्जित रहते हैं: सी जी टी जी टी जी ए सी टी सी जी सी टी सी सी टी जी ए टी (CGTGTGACTCGCTCCTGAT), हर मानव कोशिका में ऐसे तीन अरब अक्षर पाए जाते हैं !!

डी एन ए कोड, कोशिकाओं को निर्देश देता है। डी एन ए तीन अरब अक्षरों का कार्यक्रम है जो कोशिकाओं को एक खास तरीके से काम करने का निर्देश देता है। तो, यह एक पूरी निर्देश पुस्तिका है।13

-यह इतना आश्चर्यजनक क्यों है? किसी का यह पूछना तो ज़रूर बनता है कि ‘यह जानकारी का कार्यक्रम हर मानव कोशिका में आया कैसे’? यह केवल रसायन नहीं है। ये ऐसे रसायन हैं जो विस्तृत तरीके से निर्देश देते हैं कि किस तरह मानव शरीर का विकास हो।

प्राकृतिक और जैविक कारण इस का स्पष्टीकरण नहीं दे सकते। जब तक कोई जानबूझकर या ऐसे पक्के इरादे से इसे न बनाए, तो ऐसे निर्देश, ऐसी जानकारी का मिलना नामुमकिन है।

5. हम जानते हैं कि परमेश्वर का अस्तित्व है, क्योंकि वह निरन्तर हमें बुलाता है और खोजता है।

एक समय था जब मैं नास्तिक थी। बहुत से नास्तिकों की तरह यह मुद्दा, कि लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, मुझे बहुत परेशान करता था। नास्तिकों में पता नहीं ऐसा क्यों है कि वे अपना बहुत सारा समय, ध्यान और बल इस बात का खंडन करने में बिताते हैं कि परमेश्वर का अस्तित्व है ही नहीं। हमारा ऐसा करने का क्या कारण है?

-जब मैं एक नास्तिक था, मैने यह अपने ऊपर जिम्मेदारी ठान ली कि मैं उन नासमझ, भ्रांतिमय लोगों की देखभाल में समय लगाऊँगी… ताकि उनको यह एहसास कराने में मदद कर सकूँ कि उनकी आशा पूरी तरह व्यर्थ है। ईमानदारी से बताऊँ, तो मेरी एक दूसरी इच्छा भी थी। मैं यह देखने के लिए इच्छुक थी कि जब मैं परमेश्वर पर विश्वास करने वालों को चुनौती दूँ, तो क्या वे मुझे परमेश्वर में यकीन दिला सकेंगे? मेरी खोज का एक अंश यह भी था कि मैं परमेश्वर के विषय से मुक्त हो सकूँ। मेरा यह मानना था कि अगर मैं परमेश्वर को माननेवालों को गलत सिद्ध कर दूँ, तो सारा मामला ही सुलझ जाएगा, और मैं अपने जीवन में आराम से आगे बढ़ जाऊँगी।

मैंने यह कभी नहीं सोच था, कि परमेश्वर का विषय मेरे दिमाग पर इतना हावी इसलिए था क्योंकि स्वयं परमेश्वर इस मुद्दे पर दबाव डाल रहा था। मैंने यह जाना है कि परमेश्वर खुद चाहता है कि लोग उसे जाने। उसने हमे इसलिए रचा कि हम उसे जानें। उसने हमारे चारों तरफ अपने होने के सबूत छोड़े, और हमारे सामने अपने अस्तित्व के प्रश्न पैदा किए। शायद इसलिए मैं परमेश्वर के होने की संभावना के प्रश्न को सोचने से भाग नहीं पा रही थी। वास्तव में जिस दिन मैंने परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किया, मेरी प्रार्थना इस शब्द से शुरू हुई, “ठीक है, आप जीते…” एक अन्तर्निहित कारण कि नास्तिक लोग परमेश्वर को मानने वालों से खीजे रहते हैं, यह हो सकता है कि परमेश्वर खुद सकारात्मक रूप से उनके पीछे उन्हें बुला रहा है।

केवल मैं ही ऐसी नहीं हूँ जिसने इसका अनुभव किया। मेलकम मग्रिज, एक समाजवादी और दार्शनिक लेखक, ने लिखा है, “मेरी ऐसी धारणा है कि, खोज के अलावा, मेरा पीछा किया जा रहा है।‘’ सी. एस. लुईस ने कहा कि उन्हे याद है, “एक के बाद एक कई रातों के बाद काम से एक क्षण के लिए भी जब मेरा ध्यान हटा तो परमेश्वर का स्थिर और दृढ़ तरीक़े से मेरे समीप आना, जिसकी इच्छा मुझे बिलकुल नहीं थी, मुझे महसूस होती थी। मैंने परमेश्वर को स्वीकार किया और यह माना कि परमेश्वर परमेश्वर है, और घुटनों पर बैठकर मैंने प्रार्थना की: शायद उस रात मैं पूरे इंगलैंड का सबसे उदास और अनिच्छुक धर्मांतरित व्यक्ति था।'’

परमेश्वर को जानने का नतीजा यह हुआ कि लुईस ने एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक था, “सरप्राइज्ड बाइ जॉय”(खुशी से हैरान) । परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकारने के अलावा मुझे और कोई उम्मीद नही थी। फिर भी आनेवाले कई महीनों में, मैं अपने लिए परमेश्वर का प्रेम देखकर चकित रह गयी।

6. परमेश्वर के दूसरे रहस्योद्घाटनों के अलावा, यीशु मसीह ही परमेश्वर के सबसे विशिष्ट और स्पष्ट तस्वीर हैं।

यीशु ही क्यों, पूरे संसार के महान धर्मों पर एक दृष्टि डालिए और आप देखेंगे कि बुद्ध, मोहम्मद, कनफ्यूसियस और मूसा, उन सभी ने अपनी पहचान एक शिक्षक या पैग़म्बर/भविष्यवक्ता के रूप में कराई। उनमें से किसी ने भी परमेश्वर के बराबर होने का दावा नहीं किया। आश्चर्यजनक रूप से ऐसा केवल यीशु मसीह ने किया। इसी बात ने यीशु को सबसे अलग स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया है। यीशु ने कहा कि परमेश्वर है और आप उसे देख रहें हैं। जब उन्होंने अपने परमपिता की बात की, जो स्वर्ग में हैं, उन्हें अलग नहीं बताया, बल्कि उनके साथ एक अद्वित्य निकटता के मायने से बताया, जो की मानवता ने पहले कभी न सुनी ना देखी है। यीशु ने कहा, “जिसने भी उन्हें देखा है, उसने परम पिता को देखा है, जिसने भी उनपर विश्वास किया, उसने परम पिता पर विश्वास किया।‘’ उन्होंने कहा, “जगत की ज्योति मैं हूँ; जो मेरे पीछे हो लेगा, वह अन्धकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा।”14 यीशु ने अपने में परमेश्वर से संबंधित विशेषताओं के होने का दावा किया: जैसे की लोगों को उनके पापों के लिए क्षमा कर सकने की सामर्थता, पाप करने की प्रवृत्ति से मुक्त कराना, लोगों को बहुतायत का जीवन, और स्वर्ग में उन्हें अनन्त जीवन देने का दावा। दूसरे गुरूओं के विपरीत, जो लोगों को अपने शब्दों पर ध्यान केंद्रित कराते थे, यीशु ने लोगों का ध्यान अपनी तरफ दिलवाया। उन्होंने यह नहीं कहा, “मेरे शब्दों का अनुसरण करो तब तुम्हे सच की प्राप्ति होगी।” उन्होंने कहा, “मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता।”15

यीशु ने दिव्य होने का दावा करने के क्या सबूत दिए?

-उन्होंने वह किया जो और लोग नहीं कर सकते। यीशु ने चमत्कार किए। लोगों को चंगा किया… अंधे, विकलांग, बहरे और कुछ लोगों को जो मर चुके थे, उन्हे जीवित किया। वस्तुओं पर उनका अधिकार था…उन्होंने हवा से खाना बनाया जो कि कई हजार लोगों की भीड़ का पेट भरने के लिए काफी था। उन्होंने प्रकृति पर चमत्कार दिखाए व एक झील पर चलकर गए। कुछ दोस्तों के लिए एक उग्र तूफान को रुकने की आज्ञा दी। सभी जगहों से लोग यीशु के पीछे चलने लगे क्योंकि यीशु उनकी जरूरतों को पूरा करते रहे और चमत्कार करते रहे। उन्होंने कहा, “अगर आप जो मैं कह रहा हूँ उसपर विश्वास नहीं करना चाहते हैं, तो कम से कम उन चमत्कारों को देखकर मुझपर विश्वास कीजिए जो आपने देखे हैं।”16

यीशु ने बताया कि परमेश्वर सौम्य, प्रेम करनेवाला, हमारी आत्म-केन्द्रितता और हमारी कमियों को जाननेवाला है। इसके बावजूद भी परमेश्वर हमारे साथ एक गहरा रिश्ता रखना चाहता है। यीशु ने बताया कि हालांकि परमेश्वर हमें पापी मानता है जो दंड के योग्य हैं, फिर भी वह हमसे बहुत प्रेम करता है, जिसके कारण उसने एक अलग योजना बनाई। परमेश्वर ने स्वयं मनुष्य का रूप लिया और हमारे पापों का दंड हमारी तरफ से खुद पर स्वीकार किया। सुनने में यह बहुत ही ऊटपटांग लगता है लेकिन, शायद बहुत से प्यार करनेवाले पिता यह इच्छा करते हैं की उनके बच्चे का कैंसर वह अपने ऊपर ले लें। बाइबल कहती है कि हम परमेश्वर से इसलिए प्रेम करेंगे, क्योंकि पहले परमेश्वर ने हमसे प्यार किया।

यीशु मसीह हमारी जगह/हमारे स्थान पर मरे ताकि हमें माफ़ी मिल सके। मानवता के जितने भी धर्म हों, केवल यीशु द्वारा हम परमेश्वर को मनुष्य तक पहुँचता हुआ देखते हैं, ताकि हमें उस के साथ रिश्ता बनाने के लिए रास्ता मिले। यीशु यह सिद्ध करते हैं कि उनके शुद्ध ह्रदय में प्रेम है, हमारी जरूरतों को पूरा करते हैं, और हमें अपनी तरफ खींचते हैं। यीशु की मृत्यु तथा उनके पुनःजी उठने के कारण, वह आज हमें एक नया जीवन प्रदान करते हैं। हमें माफ़ी मिल सकती है, परमेश्वर के द्वारा हमें पूरी तरह अपनाया जा सकता है और हमें परमेश्वर का पवित्र प्रेम मिल सकता है। वे कहते हैं, “मैं तुझ से सदा प्रेम रखता आया हूँ; इस कारण मैं ने तुझ पर अपनी करुणा बनाए रखी है।” 17 ऐसे दिखाता है परमेश्वर अपना प्रेम।

क्या परमेश्वर हैं? अगर आप जानना चाहते हैं, तो यीशु के बारे में पता लगाइए। हमें बताया गया है, “परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उसपर विश्वास करे वह नाश ना हो परन्तु अनन्त जीवन पाए।”18

परमेश्वर हमें अपने ऊपर विश्वास करने के लिए मजबूर या ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं करते, हालांकि वे चाहें तो ऐसा कर सकते हैं। उन्होंने अपने अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत दिए हैं, ताकि हम अपनी इच्छा से उसकी ओर आ सकें। धरती की सूर्य से बिलकुल सही दूरी, जल का अद्वितीय रासायनिक गुण, मानव मस्तिष्क, डी एन ए, अनेक लोगों की गवाही जो प्रभु को जानने का दावा करते हैं, हमारे ह्रदय औऱ मस्तिष्क की जिज्ञासा जो यह निश्चित करना चाहती है कि परमेश्वर है, परमेश्वर को यीशु के माध्यम से जानने की इच्छा। अगर आप यीशु के बारे में और ज्यादा जानना चाहते हैं, उनपर विश्वास करने का कारण ढूँढना चाहते हैं, तो देखें : बियोंड ब्लाइंड फेथ ( अंध विश्वास से परे )

अगर आप परमेश्वर के साथ अभी एक रिश्ता शुरू करना चाहते हैं तो कर सकते हैं।

यह आपका निर्णय/फ़ैसला है। कोई ज़बरदस्ती से आपको यह नहीं करवा सकता। पर यदि आप परमेश्वर के द्वारा माफ़ी चाहते हैं, और उसके साथ एक रिश्ता बनाना चाहते हैं, तो यह आप उनसे माफी मांगकर, और उन्हें अपने जीवन में आमंत्रित कर के, इसी समय कर सकते हैं। यीशु ने कहा, “देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूं; यदि कोई मेरा शब्द सुन कर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आ कर उसके साथ भोजन करूंगा, और वह मेरे साथ।’’19 यदि आप यह करना चाहते हैं, पर निश्चय नहीं कर पा रहे हैं कि किस तरह शब्दों में इसे कहा जाए तो यह आपकी सहायता करेगा: “यीशु मेरे पापों के कारण मरने के लिए आपका धन्यवाद। आप मेरे जीवन के विषय में जानते हैं और यह भी जानते हैं कि मुझे क्षमा चाहिए। मैं आपसे इसी समय क्षमा, और अपने जीवन में आने की याचना करता हूँ। मैं आपके बारे में वास्तविक रूप से जानना चाहता हूँ। इसी समय मेरे जीवन में आइए। आप मेरे साथ एक रिश्ता बनाना चाहते हैं, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद कहता हूँ। आमीन।”

परमेश्वर, उनके साथ जो आपने रिश्ता बनाया है, उसको स्थाई मानते हैं। जो लोग उन पर विश्वास करते हैं, उन के बारे में बताते हुए यीशु कहते हैं, “मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे चलते हैं; और मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूं, और वे कभी नाश न होंगे, और कोई उन्हें मेरे हाथ से छीन न पाएगा।”20

इन सभी तथ्यों को देखते हुए, हम इस नतीजे पर पहुँच सकते हैं कि प्रेम करनेवाले परमेश्वर का अस्तित्व है, और उन्हें व्यक्तिगत रूप से और आत्मीयता/घनिष्टता से जाना जा सकता है।

 मैंने यीशु को अपने जीवन में आने के लिए कहा (कुछ उपयोगी जानकारी इस प्रकार है) ...
 हो सकता है कि मैं अपने जीवन में यीशु को बुलाना चाहूँ, कृपया मुझे इसके बारे में और समझाएँ...
 मेरा एक सवाल है ...

लेखिका के विषय में: पहले एक नास्तिक होने के कारण, मेरिलिन एडमसन के लिए उन प्रार्थनाओं का, जो कि सुनी जा रही थीं, और उनकी एक करीबी मित्र के जीवन की उत्तमता का खंडन करना, मुश्किल हो रहा था। अपनी मित्र के विश्वास को चुनौती देने पर, मेरिलिन को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि उनसे प्राप्त सबूत परमेश्वर के अस्तित्व की ओर इशारा कर रहे थे। लगभग एक साल तक लगातार प्रश्नों के बाद मैरिलिन परमेश्वर के उनके जीवन में आने के प्रति अनुकूल हो गयीं। उन्हें परमेश्वर पर विश्वास हो गया, जो कि उनके विश्वास की निरंतर पुष्टि करता रहा और उनके लिए लाभप्रद सिद्ध हुआ।

(1) रोमियो 1:19:20 (2) यिर्मयाह 29:13:14 (3) आर.ई.डी.क्लार्कक्रिएशन(लंदनटाइडेलप्रेस1946) पी.20 (4) दवंडर्सऑफगोड्सक्रिएशन ,मूडीइन्स्टीट्यूटऑफसाइंस (शिकागो,आई.एल.) (5) आइ.बी.आइ.डी. (6) आइ.बी.आइ.डी. (7) आइ.बी.आइ.डी. (8) ह्यू डासन फिजिओलोजी ऑफ द आइ, पाँचवा संस्करण (न्यूयोर्कमैक्ग्रोहिल्स,1991) (9) रॉबर्ट जेस्ट्रो ‘’ मैसेज फ्रोम प्रोफेसर रॉबर्ट जेस्ट्रो ,’’ लीडर यू. कॉम ; 2002 (10) स्टीवन विन्बर्ग ; द फर्स्ट थ्री मिनट्स : ए मॉडर्न व्यू ऑफद ओरिजिन ऑफद युनिवर्स;(बेसिक बुक्स 1988 ); 5. पी (11) दिनेश डिसूजा वाट सो ग्रेट अबाउट क्रिस्चियानिटी ; ( रिजनरी पब्लिशिंग, आइ.एन.सी. 2007 , चैप्टर 11 ) (12) रिचर्ड फेनमन , द मीनिंग ऑफ इट ऑल : थौट्स ऑफ ए सिटिजन साइंटिस्ट ( न्यूयोर्क : बेसिक बुक्स, 1998 ), 43 (13) फ्रांसिस एस कौलिन्स , डाइरेक्टर ऑफ द ह्यूमन नोट प्रोजेक्ट , लेखक – लैंगुएज ऑफ गॉड , ( फ्री प्रेस, न्यूयॉर्क एन वाइ ) 2006 (14) यूहन्ना 8:12 (15) यूहन्ना 14:6 (16) यूहन्ना 14:11 (17) यिर्मयाह 31:3 (18) यूहन्ना 3:16 (19) प्रकाशित वाक्य 3:20 (20) यूहन्ना 10:27-29

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