जीवन और परमेश्वर के बारे में सवालों का पता लगाने के लिए एक सुरक्षित जगह
जीवन और परमेश्वर के बारे में सवालों का पता लगाने के लिए एक सुरक्षित जगह

आदर्श परमेश्वर की इच्छा और उसे ढूँढना

परमेश्वर की इच्छा – संसार ईश्वर के कई अलग विवरण प्रस्तुत करता है - बाइबल में जिस ईश्वर को बताया गया है क्या वही आदर्श ईश्वर है ?

हममें से बहुतों के मस्तिष्क में आदर्श ईश्वर है। शायद हम सोचते हैं ईश्वर को सक्षम, हमारे साथ संबंध बनाने में समर्थ और हमारा देखभाल करनेवाला होना चाहिए। ये सभी गुण ईश्वर में हैं जैसा कि बाइबल हमें बताती है ----

1. परमेश्वर हमसे बहुत महान है

-मानवता ने हाल ही के वर्षों में महान छलांग लगाई है। हम अपने पूर्वजों से ज्यादा समय तक जीवित रह सकते हैं, ध्वनि की गति से ज्यादा तेज उड़ सकते हैं और कम्प्यूटर के कीबोर्ड से पूरे संसार तक पहुँच सकते हैं। जहाँ हमने कुछ तरीकों में प्रगति की है वहीं ऐसा लगता है कि बहुत सी चीजों में हम पिछड़ गए हैं। हर दशक में, हम देखते हैं कि हिंसक अपराध, तलाक की संख्या, किशोरवर्ग में आत्महत्या की संख्या बढ़ रही है। संसार में हजारों लोग एच आई वी के संपर्क में आ रहे हैं। सौ करोड़ से ज्यादा लोग चिरकालीन भूख से ग्रस्त हैं। सूची इसी प्रकार बढती रहेगी। उदाहरणस्वरूप हाल ही के दशक में संसार के अंदर हुए बहुत से युद्धों के हम गवाह हैं। अगर मानवता परमेश्वर है तो ऐसा नहीं लगता हम उसके लिए बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं। तकनीक के बढने के बाद भी अपराध, तलाक, सरकार द्वारा थोपी गई भूख, जातीय संघर्ष आज भी हो रहे हैं। अतः क्या यह

बेहतर नहीं है कि हमारा एक परमेश्वर हो जो मानवता से महान हो, एक ईश्वर जो हमें वहाँ से आगे ले जाने में सक्षम हो जहाँ तक हम अपनेआप पहुँच सकते हैं?

बाइबल में जिस ईश्वर के बारे में बताया गया है, यह वही ईश्वर है। वह ब्रह्मांड का रचयिता होने का दावा करता है। एक उत्कृष्ट, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान जीव जो हमेशा से अस्तित्व में था और जो सभी वस्तुओं का निर्वाहक है। वह कहता है,“मैं ने ही पृथ्वी को बनाया और उसके ऊपर मनुष्यों को सृजा है; मैं ने अपने ही हाथों से आकाश को ताना और उसके सारे गणों को आज्ञा दी है।1 “प्राचीनकाल की बातें स्मरण करो जो आरम्भ ही से है; क्योंकि ईश्वर मैं ही हूं, दूसरा कोई नहीं; मैं ही परमेश्वर हूं और मेरे तुल्य कोई भी नहीं है।”2 “ प्रभु परमेश्वर वह जो है, और जो था, और जो आने वाला है; जो सर्वशक्तिमान है : यह कहता है, कि मैं ही अल्फा और ओमेगा हूं॥”3

2. ईश्वर को निजी तौर पर जाना जा सकता है।

-आजकल यह सोचना प्रचलित है कि ईश्वर किसी तरह का शक्तिक्षेत्र है जो सब चीजों में रहता है। ईश्वर की शक्ति के द्वारा सभी जो चीजें अस्तित्व में हैं क्षण प्रतिक्षण और निरंतर रहती हैं,पर ईश्वर उससे कहीं बढ़कर है। उदाहरणस्वरूप क्या ऐसा ज्यादा उचित नहीं है कि ईश्वर ऐसा हो जो माता पिता की तरह हो,जो भाई या दोस्त हो जिससे आप बात कर सकते हैं, अपनी परेशानियाँ बांट सकते हैं, मार्गदर्शन ले सकते हैं, जीवन का उसके साथ अनुभव कर सकते हैं। परमेश्वर के विषय में ऐसा विशिष्ट क्या है जो अवैयक्तिक, अज्ञेय और अलग है?

उसकी भव्यता और भिन्नता के बावजूद बाइबल के परमेश्वर को जाना जा सकता है और वह चाहता है कि हम उन्हें जानें। हालाँकि ईश्वर दिखता नहीं है, पर हम उससे बात कर सकते हैं, उससे प्रश्न पूछ सकते हैं और उसे सुन सकते हैं। वह हमें उत्तर और जीवन के लिए मार्गदर्शन देता है। वह ज्यादातर उत्तर और मार्गदर्शन अपने शब्द बाइबल द्वारा देता है, जिसे बहुत से लोग हमारे लिए ईश्वर का प्रेमपत्र मानते हैं।

एक मनुष्य ईश्वर के साथ वैसा ही रिश्ता रख सकता है जैसा कि वह अपने परिवार के सदस्य के साथ रखता है। जो उसे जानते हैं उन्हें वह अपने बच्चे, वधू और दोस्त कहता है। अतः बाइबल का ईश्वर कुछ भी हो पर अवैयक्तिक है। वह नाराज और दुखी होता है, दया दिखाता है और माफ करता है। वह एक भावात्मक जीव है। वह अत्यधिक बुद्धिमान है, उसका अपना एक व्यक्तित्व है और वह चतुर है। उसके बारे में केवल जानकारी रखने के बजाय हम उसके बारे में और ज्यादा जान सकते हैं। हम उसे बहुत नजदीक से अपने सबसे अच्छे मित्र की तरह जान सकते हैं। “ और अनन्त जीवन यह है, कि वे तुझ अद्वैत सच्चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को, जिसे तू ने भेजा है, जाने।”4

3. ईश्वर को मनुष्य के अनुभवों द्वारा बताया जा सकता है।

-कुछ लोग सोचते हैं कि ईश्वर दूर और अलग है। उसने ब्रह्मांड की रचना की और उसे अपना काम करने के लिए अकेले छोड़ दिया। क्या यह उचित नहीं होता कि ईश्वर ब्रह्मांड के साथ शामिल होता और विशिष्टतः यह देखता कि पृथ्वी पर क्या

हो रहा है? उन विशिष्ट परेशानियों, जिम्मेदारियों चुनौतियों का क्या, जिसका हम मानव जीवन में रोज - रोज सामना करते हैं। क्या यह उचित नहीं है कि ईश्वर ऐसा हो जो इन चीजों के बारे में समझता हो ? वह यह देखता कि इस कठोर संसार में जिसको उसने अस्तित्व दिया जीवन व्यतीत करना कैसा है ?

बाइबल का ईश्वर समझता है कि हममें से एक होना कैसा है ? ईशु मसीह केवल ईश्वर के पुत्र नहीं थे, बल्कि वह ईश्वर थे, जिन्होंने मानव का रूप और स्वभाव लिया। “ आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था।” “और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के इकलौते की महिमा। ”5

ईश्वर के पुत्र के बारे में, बाइबल कहती है, “ वह उस की महिमा का प्रकाश, और उसके तत्व की छाप है, और सब वस्तुओं को अपनी सामर्थ्य के वचन से संभालता है: वह पापों को धोकर ऊंचे स्थानों पर महामहिम के दाहिने जा बैठा। ”6 “ वह तो अदृश्य परमेश्वर का प्रतिरूप और सारी सृष्टि में पहिलौठा है ”7 “क्योंकि हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ, हमें एक पुत्र दिया गया है; और प्रभुता उसके कांधे पर होगी, और उसका नाम अद्भुत, युक्ति करने वाला, पराक्रमी परमेश्वर, अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राजकुमार रखा जाएगा। ”8 “ और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहां तक आज्ञाकारी रहा, कि मृत्यु, हां, क्रूस की मृत्यु भी सह ली। ”9

“ क्योंकि उस में ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता सदेह वास करती है ”10 और “ क्योंकि उसी में सारी वस्तुओं की सृष्टि हुई, स्वर्ग की हो अथवा पृथ्वी की, देखी या अनदेखी, क्या सिंहासन, क्या प्रभुतांए, क्या प्रधानताएं, क्या अधिकार, सारी वस्तुएं उसी के द्वारा और उसी के लिये सृजी गई हैं।”11

यीशु ने उस से कहा; “ मैं इतने दिन से तुम्हारे साथ हूं, और क्या तू मुझे नहीं जानता? जिस ने मुझे देखा है उस ने पिता को देखा है: तू क्यों कहता है कि पिता को हमें दिखा।”12 “और जो मुझे देखता है, वह मेरे भेजने वाले को देखता है।”13 मैं और पिता एक हैं।”14

हालाँकि यीशु मसीह पूरे ईश्वर थे, पर वह पूरे मानव भी थे। वे भूखे रहे, सोए, रोए, खाए। उन्होंने हर तरह की कठिनाइयाँ सहीं जो हम सहते हैं, उसके अलावा कुछ और सहीं। अतः बाइबल कहती है,“ क्योंकि हमारा ऐसा महायाजक नहीं, जो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुखी न हो सके; वरन वह सब बातों में हमारी नाईं परखा तो गया, तो भी निष्पाप निकला।”15

अतः बाइबल का ईश्वर संसार के दर्द, दुख और बुराइयों से कभी तटस्थ नहीं रहा। उन्होंने जीवन को उस तरह सहा जिस तरह उन्हें सहना चाहिए। जब तक वे इस ग्रह पर रहे उनके लिए यह बहुत ही बुरा समय था। वे एक गरीब परिवार में पैदा हुए। वे शारीरिक रूप से आकर्षक नहीं थे, उन्होंने लोगों की पूर्वधारणा और घृणा सही, परिवार और दोस्तों ने उन्हें गलत समझा और उन्हें गलत तरीके से निष्पादित किया गया।

4. परमेश्वर हमारी चिंता या देखभाल करता है।

-हममें से सभी चाहते हैं कि हमें प्यार और स्वीकार किया जाय। हम चाहते हैं कि लोग अपने बनावटी शब्दों के बजाय वास्तव में हमारी चिन्ता करें। उनकी परवाह और चिन्ता उनके कार्यों से सिद्ध हो। क्या यह सच ईश्वर के साथ भी समान नहीं है अर्थात् ,क्या यह उत्तम नहीं होगा कि ईश्वर सच में हमारी चिंता करें और उसके बाद उस प्रेम का हमें ठोस सबूत दें।

बाइबल का यह ईश्वर वास्तव में हमारी चिन्ता करता है। उसने अपने शब्दों में यह कहा है। बाइबल कहती है, ,“ जो प्रेम नहीं रखता, वह परमेश्वर को नहीं जानता है, क्योंकि परमेश्वर प्रेम है। और जो प्रेम परमेश्वर हम से रखता है, उस को हम जान गए, और हमें उस की प्रतीति है; परमेश्वर प्रेम है: जो प्रेम में बना रहता है, वह परमेश्वर में बना रहता है; और परमेश्वर उस में बना रहता है।”16 पर शब्दों से चिंता और परवाह व्यक्त नहीं होती जितनी की कारवाई से।यहीं पर बाइबल का ईश्वर अति कमाल का और अद्वितीय है। वास्तव में उसने दिखाया कि वह हमारी कितनी परवाह करता है।

“जो प्रेम परमेश्वर हम से रखता है, वह इस से प्रगट हुआ, कि परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को जगत में भेजा है, कि हम उसके द्वारा जीवन पाएं। “ प्रेम इस में नहीं कि हम ने परमेश्वर ने प्रेम किया; पर इस में है, कि उस ने हम से प्रेम किया; और हमारे पापों के प्रायश्चित्त के लिये अपने पुत्र को भेजा।”17 “ क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।18

बाइबल का ईश्वर पवित्र और सही होने का दावा करता है। “ जो समाचार हम ने उस से सुना, और तुम्हें सुनाते हैं, वह यह है; कि परमेश्वर ज्योति है: और उस में कुछ भी अन्धकार नहीं। ”19 वह साफ और पवित्र रिश्ते की चाह रखता है। अतः ईश्वर ने खुद के बेटे को हमारे पास भेजा ताकि हम ईश्वर के सामने अपने आप को साफ करने का एक रास्ता बना सके। यीशु ने नैतिक रूप से एक परिपूर्ण जीवन जिया और उसके बाद भुगतान के रूप में उन सभी गलत बातों के लिए जो हमने कहीं, की या सोची ( जो पाप है ) उन्हे पीटा गया, प्रताड़ित किया गया और शूली पर चढ़ा दिया गया। एक तरह से वे हमारे लिए, हमारी जगह मरे - “ जो पाप से अज्ञात था, उसी को उस ने हमारे लिये पाप ठहराया, कि हम उस में होकर परमेश्वर की धामिर्कता बन जाएं॥”20 “ हम तो सब के सब भेड़ों की नाईं भटक गए थे; हम में से हर एक ने अपना अपना मार्ग लिया; और यहोवा ने हम सभों के अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया॥”21

ईश्वर ने हमारी इतनी चिन्ता की कि उसने अपने पुत्र को हमारी जगह हमारे पापों के लिए मरने भेज दिया। इस प्रकार ईश्वर जो कुछ जरूरी था वह खुशी से करना चाहता था ----- हमारे पापों से निपटना जरूरी था। अब हमें पूरी तरह क्षमा मिल सकती है और हम बिना किसी रुकावट के ईश्वर के साथ एक नया रिश्ता शुरू कर सकते हैं।

5. ईश्वर वह है जिसका चीजों पर पूरा नियंत्रण है।

-संसार की सभी भयानक चीजें यह सिद्ध करती हैं कि एक अच्छे और सर्वशक्तिमान ईश्वर का अस्तित्व नहीं है, यह जरूरी नहीं है। एक सम्पूर्ण ईश्वर भी एक ऊँची य़ोजना के हिस्से के अनुसार कुछ समय के लिए बुरी चीजों को होने दे सकता है। ईश्वर को पता हो सकता है कि हर समय क्या हो रहा है और वह उतना ही होने देता है जितना उसकी बड़ी योजना के अंतर्गत होने की जरूरत है। बाइबल का ईश्वर वह ईश्वर है। वह यह दावा करता है कि उसकी इच्छा के बिना धरती पर कुछ नहीं हो सकता है। उसका सभी चीजों पर पूर्ण संप्रभुत्व है। “ यदि यहोवा ने आज्ञा न दी हो, तब कौन है कि वचन कहे और वह पूरा हो जाए ?”22 “ मैं तो अन्त की बात आदि से और प्राचीनकाल से उस बात को बताता आया हूं जो अब तक नहीं हुई। मैं कहता हूं, मेरी युक्ति स्थिर रहेगी और मैं अपनी इच्छा को पूरी करूंगा।”23 “ यहोवा की युक्ति सर्वदा स्थिर रहेगी, उसके मन की कल्पनाएं पीढ़ी से पीढ़ी तक बनी रहेंगी।”24 “ मनुष्य के मन में बहुत सी कल्पनाएं होती हैं, परन्तु जो युक्ति यहोवा करता है, वही स्थिर रहती है।”25 इसका मतलब यह नहीं है कि जो कुछ भी होता है वह ईश्वर जैसा ही हो। उदाहरणस्वरूप – यीशु ने अपने शिष्यों को बताया कि किस तरह प्रार्थना करो, उसमें एक सबसे मुख्य कथन है, “ तेरा राज्य आए; तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो।”26

ईश्वर की नैतिक इच्छा स्वर्ग में पूरी होती है, न कि पृथ्वी पर। जब तक ईश्वर का सभी चीजों पर प्रभुत्व है उसे पृथ्वी पर होनेवाली हर चीज पसंद नहीं है। पर कुछ कारणवश,वह उन चीजों को होने देता है। (उसकी स्वीकृत इच्छा) , शायद पसंद करने की स्वतंत्रता हमें मिली है क्योंकि हम मानव हैं।

पर बाइबल के ईश्वर की एक योजना है और वह चुप नहीं बैठेगा “ जब तक यहोवा अपना काम और अपनी युक्तियों को पूरी न कर चुके, तब तक उसका क्रोध शान्त रखना होगा। अन्त के दिनों में तुम इस बात को भली भांति समझ सकोगे।”27 वह योजना क्या है? ईश्वर का अन्तिम लक्ष्य उन लोगों के साथ रहना है जो उस वातावरण से बिल्कुल अलग वातावरण में रह रहे हैं, जिसकी आज हमें अनुभूति हो रही है। उस दूसरी दुनिया के बारे में ईश्वर कहते हैं, “ फिर मैं ने सिंहासन में से किसी को ऊंचे शब्द से यह कहते सुना, कि देख, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है; वह उन के साथ डेरा करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्वर आप उन के साथ रहेगा; और उन का परमेश्वर होगा। ” “ और वह उन की आंखोंसे सब आंसू पोंछ डालेगा; और इस के बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहिली बातें जाती रहीं। ” “ और जो सिंहासन पर बैठा था, उस ने कहा, कि देख, मैं सब कुछ नया कर देता हूं: फिर उस ने कहा, कि लिख ले, क्योंकि ये वचन विश्वास के योग्य और सत्य हैं।”28

6. ईश्वर वह है जो जीवन को एक अर्थ और एक कारण देता है।

-अगर आप एक जरूरी काम या प्रोजेक्ट के बारे में सोचेंगे जो आपने पूरा कर लिया है तो शायद आपको याद आए कि काम का उद्देश्य क्या था। क्या आप चाहते हैं कि आपकी पूरी जिन्दगी ऐसी हो ? किसी के लिए क्या कोई परमेश्वर है जिसने आपका जीवन किसी कारण से रचा है तथा वह आपको उस कारण के अनुभव से परिचित कराएगा ?

जी हाँ, बाइबल का ईश्वर यह कर सकता है। वह प्रण करता है कि हमारे जीवन को अर्थपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण बनाएगा। उससे रिश्ता रखकर हम यह कर सकते हैं,“ क्योंकि हम उसके बनाए हुए हैं; और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिये सृजे गए जिन्हें परमेश्वर ने पहिले से हमारे करने के लिये तैयार किया॥”29 हम दूसरों के जीवन में एक सकारात्मक अंतर ला सकते हैं। हम ईश्वर की प्रमुख योजना का एक भाग बन सकते हैं। बाइबल का ईश्वर यह भी कहता है, उसके साथ के क्षण प्रतिक्षण के रिश्ते में, वह हमारे कदमों को सही दिशा दे सकता है ताकि हम वह कर सकें जो उसे खुशी दे और जो हमारे उत्तम रुचि के अनुसार हो, “उसी को स्मरण करके सब काम करना, तब वह तेरे लिये सीधा मार्ग निकालेगा।”30

ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि जीवन पूर्णतः उत्तम हो जाएगा। बीमारियाँ, जीवन में परेशानियाँ, व्यक्तिगत असफलताएँ तो फिर भी होंगी। जीवन पूर्ण नहीं होगा,पर वह ज्यादा परिपूर्ण हो जायगा। ईश्वर को जानने के लाभ होंगे।वह कहता है, “पर आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, मेल, धीरज “और कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम हैं; ऐसे ऐसे कामों के विरोध में कोई भी व्यवस्था नहीं।”31

7. ईश्वर वह है जो सच्ची परिपूर्णता दे सके।

-हम सब जीवन में एक पूर्णता पाना चाहते हैं, जैसे प्यार और स्वीकृति। हम सब में ऐसा लगता है कि एक प्यास है जो तृप्त होना चाहती है।पर वह प्यास – हम कितनी भी कोशिश करें – वह ऐसी चीजों से तृप्त नहीं होती जैसे – पैसा, प्यार, संपत्ति या मनोरंजन। अतः क्या यह उत्तम नहीं होगा कि एक ईश्वर हो जो उस प्यास को बुझाए ? एक ईश्वर जिसका होना हमारे जीवन में एक हद तक संतोष उत्पन्न करे।

बाइबल का ईश्वर संभवतः सबसे परिपूर्ण जीवन हमें देता है। यीशु कहते हैं, “ चोर किसी और काम के लिये नहीं परन्तु केवल चोरी करने और घात करने और नष्ट करने को आता है। मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएं, और बहुतायत से पाएं”32 “ यीशु ने उन से कहा, जीवन की रोटी मैं हूं: जो मेरे पास आएगा वह कभी भूखा न होगा और जो मुझ पर विश्वास करेगा, वह कभी प्यासा न होगा।”33 अतः बाइबल का ईश्वर वादा करता है कि वह अंदर की उस प्यास को बुझाएगा जो किसी और चीज से नहीं बुझेगी।

एक आदर्श ईश्वर की इच्छा करना -

बाइबल के अनुसार, केवल एक ही सच्चा ईश्वर है, सभी चीजों का केवल एक ही रचयिता है। पर वह ईश्वर एक आदर्श और उत्तम ईश्वर है। हम और किसी और दूसरे ईश्वर के अस्तित्व की इच्छा नहीं कर सकते। इस लेख ने इस सतह को कुरेदा कि बाइबल का ईश्वर कैसा है ? अगर आप इस विषय पर और खोज करना चाहते हैं तो आप बाइबल के उस भाग को पढ़ सकते हैं जो “जॉन” कहलाता है। अगर आप ईमानदार है और बाइबल का ईश्वर वास्तविक है, तो क्या यह नहीं होना चाहिए कि वह ईश्वर अपने आपको आपके सामने प्रकट करे ? वह कहता है, “ जो मुझ से प्रेम रखते हैं, उन से मैं भी प्रेम रखती हूं, और जो मुझ को यत्न से तड़के उठ कर खोजते हैं, वे मुझे पाते हैं।”34 “ मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढ़ो, तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा।” 35

सच्चा ईश्वर अबतक का संभवतः सबसे उत्तम ईश्वर है।

आप आश्चर्य कर रहे होंगे कि आप इस आदर्श ईश्वर के बारे में कैसे जानेंगे ? ईश्वर के साथ एक रिश्ता शुरू करना एक विवाह शुरू करने के समान है। अपनी इच्छा से यह प्रण लेना कि हमें ईश्वर के साथ एक रिश्ता बनाना है। आप उससे कहते हैं और वफादारी से मानते हैं “मैं मानता हूँ ”

य़ीशु मसीह हमारे पापों के लिए मरे, तीन दिन के बाद वे जीवित हुए और वे आज भी जीवित और स्वस्थ हैं। अब वे हमें एक नया जीवन देना चाहते हैं। हम अपने पापों के लिए उनसे क्षमा माँगने में विश्वास करें, “ क्योंकि मेरे पिता की इच्छा यह है, कि जो कोई पुत्र को देखे, और उस पर विश्वास करे, वह अनन्त जीवन पाए; और मैं उसे अंतिम दिन फिर जिला उठाऊंगा।”36

ईश्वर लोगों की इज्जत करनेवाला नहीं है।सारे लोग उसकी छाया में रचे गए हैं।अतः उसके अनन्त परिवार को इस तरह बताया गया है, “ इस के बाद मैं ने दृष्टि की, और देखो, हर एक जाति, और कुल, और लोग और भाषा में से एक ऐसी बड़ी भीड़, जिसे कोई गिन नहीं सकता था श्वेत वस्त्र पहिने, और अपने हाथों में खजूर की डालियां लिये हुए सिंहासन के सामने और मेमने के सामने खड़ी है ”37

आपके जीवन का कोई भी पाप आपको ईश्वर से रिश्ता बनाने से नहीं रोक सकता। उसने उस पाप का ध्यान शूली पर चढ़कर रखा है। अब यह आप पर है कि आप य़ीशु मसीह के मरने पर कितना विश्वास करते हैं जो आपके लिए मरे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपने भूतकाल में क्या किया।

एक बार जब आप ईश्वर से रिश्ता कायम कर लेंगे तो वह रिश्ता अनन्तकाल तक चलेगा। पर इसका मतलब यह भी है कि आज उस रिश्ते में रहना और उसे इस जीवन में कायम रखना, तब वह रिश्ता समय के साथ और गहरा होगा। किसी भी रिश्ते की तरह उसमें उतार – चढ़ाव, खुशी और दुख के क्षण आएँगे। पर आप ईश्वर के साथ एक रिश्ते में रहेंगे जिसने आपको किसी खास कार्य के लिए (उसे जानने के लिए) रचा है।

क्या आप ऐसा महसूस करते हैं कि ईश्वर आपके ह्रदय पर दस्तक दे रहा है। य़ीशु ने कहा, “ देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूं; यदि कोई मेरा शब्द सुन कर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आ कर उसके साथ भोजन करूंगा, और वह मेरे साथ।”38

अगर आप ईश्वर को अपने जीवन में इसी क्षण बुलाना चाहते हैं, यहाँ एक प्रार्थना का सुझाव दिया जा रहा है जो आपका मार्गदर्शन करेगी। (इसमें उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल उतना जरूरी नहीं है जितनी आपके ह्रदय की सच्चाई और वफादारी)

“ प्रिय परमेश्वर, मैं मानता हूँ कि मैं पापी हूँ। मेरा सारा पाप यीशु मसीह के रूप में शूली पर अपने पर लेने के लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। मैं आपकी क्षमा चाहता हूँ और आपके साथ एक रिश्ता कायम करना चाहता हूँ। मैं आपको अपने जीवन में इसी क्षण से मेरे रक्षक और मेरे ईश्वर बनकर आने के लिए निमंत्रित करता हूँ। आप जैसा मनुष्य मुझे बनाना चाहते हैं वैसा ही बनाइए।”

अगर आप ईश्वर से रिश्ता बनानेके बारे में और जानना चाहते हैं, तो देखिए : व्यक्तिगत रूप से ईश्वर को जानना ( नोइंग गॉड परसनली ) अगर आपने यह निश्चित कर लिया है, हम जानना चाहेंगे। कृपया हमसे संपर्क कीजिए। हमें ई मेल कीजिए। अगर इस लेख से संबंधित कोई प्रश्न आप पूछना चाहते हैं, ईश्वर को जानने के बारे में और जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं या अपने अहाते के लोगों से संपर्क स्थापित करना चाहते हैं।

 मैंने यीशु को अपने जीवन में आने के लिए कहा (कुछ उपयोगी जानकारी इस प्रकार है) ...
 हो सकता है कि मैं अपने जीवन में यीशु को बुलाना चाहूँ, कृपया मुझे इसके बारे में और समझाएँ...
 मेरा एक सवाल है ...

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