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एक परिवर्तित जीवन का उद्गम

क्या आपने कभी अपने आप को कहते हुए सुना है ,” मुझे अपने जीवन से घृणा है ? ” यहाँ बताया गया है कि किस तरह आप अपने जीवन को हमेशा के लिए बदल सकते हैं।

जोश मैग्डुवेल द्वारा

मैं खुश होने का इंतजार करता था। मैं चाहता था कि मैं संसार के सबसे खुश रहनेवाले लोगों में से एक बन सकूँ। मैं इसकी भी इच्छा करता था कि मेरे जीवन का कोई अर्थ हो। मैं इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढ़ रहा था :

  • “ मैं कौन हूँ ”
  • “ मैं इस संसार में क्यों हूँ ? ”
  • “ मैं कहाँ जा रहा हूँ ? ”

उससे भी ज्यादा , मैं स्वतंत्र होने का इंतजार करता था। मैं चाहता था कि संसार में जितने लोग भी स्वतंत्र हैं , मैं उनमें से एक बनूँ। आजादी का अर्थ सरल रूप में मेरे लिए यह नहीं था कि मैं जो चाहता हूँ करूँ – वह तो कोई भी कर सकता है। आजादी का अर्थ मेरे लिए यह था कि मुझमें वह करने की शक्ति हो जो मुझे पता हो कि मैं कर सकता हूँ। ज्यादातर लोग जानते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए। पर उनके पास करने की शक्ति नहीं होती। अतः मैंने इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढ़ने की कोशिश की।

किसी को सकारात्मक बदलाव कहाँ मिल सकता है ?

ज्यादातर लोग किसी न किसी धर्म को मानते हैं। जाहिर है मैंने भी वही किया और मैं गिरजाघर गया। शायद मैं गलत गिरजाघर में गया था क्योंकि वहाँ जाकर मैंने और बदतर महसूस किया। मैं सुबह , दोपहर और रात को गिरजाघर गया , पर उससे मदद नहीं मिली। मैं बहुत व्यावहारिक हूँ और जब कोई चीज काम नहीं करती है तब मैं उसे छोड़ देता हूँ। अतः मैंने धर्म का साथ छोड़ दिया।

मैं सोचने लगा कि क्या इसका उत्तर प्रतिष्ठा है ? एक नेता होने के नाते मैंने सोचा कि किसी कारण को स्वीकार करना , अपने आप को उस स्थिति मे डालना और उसके कारण प्रसिद्ध हो जाना शायद इसका उत्तर हो। विश्वविद्यालय में मैंने देखा कि जो छात्रों के नेता होते हैं उनके हाथ में सबकी डोरी होती है और उनकी धाक भी सब पर रहती है। अतः मैं दौड़कर कक्षा के नए छात्र अध्यक्ष के लिए चुनाव में खड़ा हुआ और जीत गया। सभी का मुझे जानना , अपने निर्णय खुद लेना और विश्वविद्यालय के पैसों को खर्च करके अपनी पसंद के वक्ता को बुलाना मेरे लिए महान अनुभव था। यह महान अनुभव था , पर हर चीज की तरह जो मैंने आजमाई थी , यह भी जल्दी ही समाप्त हो गया। सोमवार की सुबह जब मैं सोकर उठता था , पिछली रात की वजह से मेरे सिर में दर्द रहता था और मेरा रवैया ऐसा था “अच्छा , चलो और पाँच दिन बीत गए। ” मैं सोमवार से शुक्रवार तक सहता था। खुशी , सप्ताह की तीन रातों के इर्द गिर्द घूमती थी – शुक्रवार , शनिवार और रविवार। उसके बाद दोषपूर्ण चक्र फिर से शुरू हो जाता था।

जीवन में बदलाव की खोज , सकारात्मक परिवर्तन

मुझे ऐसा लगता है कि इस देश के विश्वविद्यालय और कॉलेज के कुछ लोग मुझसे ज्यादा ईमानदारी से जीवन का अर्थ , सत्य और उद्देश्य जानने की कोशिश कर रहे थे।

उस समय मैंने ध्यान दिया कि कुछ लोगों का एक छोटा सा समूह था – आठ छात्र और दो विभाग के सदस्य , जिनके जीवन में कुछ ऐसा था , जो कि अलग था। ऐसा लगता था कि उन्हें पता था कि वे जिसपर विश्वास करते हैं , उसपर वे क्यों विश्वास करते हैं। उन्हें यह भी पता था कि वे कहाँ जा रहे थे ? जिन लोगों पर मेरा ध्यान गया वे प्रेम के बारे में केवल बात नहीं करते थे – बल्कि उसमें संलग्न थे। ऐसा लगता था कि वे विश्वविद्यालय के जीवन की परिस्थितियों से ऊपर उठे हुए थे और बाकी लोग ढेर के नीचे थे। ऐसा दिखता था जैसे वे तृप्त और शांतिपूर्ण अवस्था में थे पर वह परिस्थितियों से नहीं आई थी। ऐसा दिखता था जैसे वे एक आन्तरिक खुशी के निरंतर स्त्रोत के अधिकारी थे। वे हमें चिढ़ाते हुए बहुत खुश थे। उनके पास ऎसा कुछ था जो मेरे पास नहीं था।

मेरे लिए आजादी का अर्थ था कि आप में वह करने का सामर्थ्य हो , जो आप समझते हैं कि आपको करना चाहिए।

औसत छात्रों की तरह , जब किसी के पास कुछ था , जो मेरे पास नहीं था , तो मुझे भी वह चाहिए था। मैंने निश्चय किया कि मैं इन दिलचस्प लोगों से दोस्ती करूँगा। इस निर्णय के दो सप्ताह के बाद हम सभी छात्र संघ की मेज के चारों तरफ बैठे थे – छः छात्र और दो विभाग के सदस्य। ईश्वर के बारे में हमारी बातचीत शुरू हुई।

जीवन में बदलाव का कारण पूछा गया , सकारात्मक बदलाव

वह मुझे परेशान कर रही थी। अंत में मैने उठकर एक छात्र की तरफ देखा , एक सुंदर आकर्षक महिला ( मैं सोचता था कि हर ईसाई बदसूरत होता है ) ; और मैं अपनी कुर्सी पर पीछे झुक गया ( मैं नहीं चाहता था कि दूसरे यह सोचें कि मैं उसमें रुचि ले रहा हूँ ) मैंने कहा ,” मुझे बताइए किसके कारण आपके जीवन में बदलाव आया है ? क्यों आपलोगों का जीवन कैंपस में रह रहे लोगों से अलग है ? ”

उस युवा महिला को अवश्य ही दृढ़ आस्था थी। उसने सीधे मेरी आँखों में देखा और दो शब्द कहे जो कि मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक विश्वविद्यालय में मैं उसे समाधान के रूप में सुनूँगा : “ ईसामसीह ”

मैंने कहा ,” ओह , परमेश्वर के लिए मुझे वह कूड़ा मत दो। मैं धर्म से परेशान हो चुका हूँ , मैं चर्च से परेशान हो चुका हूँ , मैं बाइबल से भी परेशान हो चुका हूँ। मुझे धर्म के नाम पर और कचरा मत दो। ”

वह पीछे हटी ,” सुनो , मैंने धर्म नहीं कहा है , मैंने ईसामसीह कहा है। ” उसने मुझे इशारे से कुछ बताया जो कि मुझे पहले पता नहीं था : ईसाई धर्म एक धर्म नहीं है। धर्म तब होता है जब मानव अच्छे कर्मों द्वारा ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग ढूँढ़ते हैं। ईसाई धर्म में खुद ईश्वर ईसामसीह के माध्यम से नर और नारी के पास उनके साथ एक रिश्ते का प्रस्ताव लेकर आते हैं।

संसार की दूसरी जगहों के बजाय संभवतः विश्वविद्यालयों में ऐसे और लोग थे जिन्हें ईसाई धर्म के बारे में यह गलतफहमी थी। कुछ समय पहले मैं एक शिक्षण सहायक से एक स्नातक संगोष्ठी में मिला जिसने यह टिप्पणी की थी ,” जो भी चर्च के अहाते में प्रवेश करता है वह ईसाई बन जाता है। ” मैंने उत्तर दिया , “ अगर आप एक एक मोटरघर में प्रवेश करेंगे तो क्या आप मोटर बन जाएँगे ? ” मुझे बताया गया कि एक ईसाई वह है जो सही मायने में ईसामसीह पर विश्वास करता है।

ईसाई धर्म को और जानने के लिए , मेरी नई मित्र ने मुझे बौद्धिक स्तर पर ईसा के जीवन को जाँचने की चुनौती दी। मैंने पता किया कि बुद्ध , मोहम्मद और कन्फ्यूशियस ने कभी भी ईश्वर होने का दावा नहीं किया , पर ईसामसीह ने किया। मेरे दोस्तों ने मुझसे ईसामसीह के ईश्वर होने के प्रमाण को देखने के लिए कहा। वे इस बात से सहमत थे कि यीशु मानव के रूप में ईश्वर थे जो मनुष्य के पापों के लिए सूली पर मरे , उन्हें दफनाया गया , तीन दिन बाद वे पुनर्जीवित हुए और आज के मनुष्य के जीवन को बदल सकते हैं।

मैंने सोचा कि यह एक धृष्टता है। वास्तव में मै सोचता था कि ईसाई , घूमनेवाले बेवकूफ हैं। मैं कुछ से मिला। मैं एक ईसाई का कक्षा में बोलने का इंतजार करता था ताकि मैं उसे ऊपर से नीचे तक तार – तार कर सकूँ और प्रोफेसर को मुक्के से मार सकूँ। मैं कल्पना कर सकता हूँ कि यदि एक ईसाई के लिए दिमागी कक्ष होता तो वह अकेलेपन से मर जाता। मैं उससे बेहतर नहीं सोच सकता था।

पर इन लोगों ने बार – बार मुझे चुनौती दी। अंत में मैंने उनकी चुनौती मान ली। मैंने अपने घमंड में उन्हें नीचा दिखाने के लिए यह किया। मैंने सोचा कि इसमें कोई तथ्य नहीं है। मैंने मान लिया था कि इसका कोई प्रमाण नहीं है जिसका एक मनुष्य मूल्यांकन कर सके।

ईसाई धर्म को और जानने के लिए , मेरे नई मित्रों ने मुझे बौद्धिक स्तर पर ईसा के जीवन को जाँचने की चुनौती दी।

काफी महीनों के अध्ययन के बाद , मेरा मष्तिष्क इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि ईसामसीह वही हैं जिसका वे दावा करते थे। पर इस सोच ने समस्या पैदा कर दी। मेरा दिमाग कहता था यह सब सही है पर मेरी इच्छा मुझे दूसरी दिशा में खींच रही थी।

मैंने यह खोजा कि ईसाई बनने का अर्थ था अपने अहं का टूट कर बिखरना। उन पर विश्वास करने के लिए ईसामसीह ने मेरी इच्छा को सीधे चुनौती दी थी। उनके कथन की मैं संक्षिप्त व्याख्या करता हूँ ,“ देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूं; यदि कोई मेरा शब्द सुन कर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आ कर उसके साथ भोजन करूंगा, और वह मेरे साथ।” ( प्रकाशित वाक्य 3:20 )

मुझे इसकी परवाह नहीं थी कि ईसामसीह पानी पर चले थे या उन्होंने पानी को शराब में बदल दिया था। मैं अपने चारों तरफ मजा खराब करनेवाला नहीं चाहता था। अच्छे समय को बर्बाद करने का इससे बेहतर तरीका नहीं ढूँढ़ सकता था। यहां मेरा दिमाग कह रहा था कि ईसाई धर्म सच्चा है और मेरी इच्छा भाग रही थी।

अधिक जागरूकता कि मैं अपने जीवन से घृणा करता हूँ।

जब भी मैं इन उत्साही ईसाइयों के बीच होता था , मेरा संघर्ष शुरू हो जाता था। जब आप दुखी होते हैं और खुशहाल लोगों के बीच में रहते हैं , तब आपको समझ में आएगा कि वे आपको कैसे दोषी साबित करते हैं। वे बहुत ज्यादा खुश होते थे और मैं बहुत ज्यादा दुखी होता था। मैं उठ खड़ा हुआ और छात्रसंघ से निकल कर भाग गया। बात इस बिन्दु तक आ गई थी कि मैं रात को सोने के लिए बिस्तर पर दस बजे जाता था पर मुझे सुबह के चार बजे तक नींद नहीं आती थी। मैं समझ गया था कि मुझे यह बात अपने दिमाग से निकालनी पड़ेगी, इससे पहले कि मेरा दिमाग खराब हो जाए। अंत में मेरे दिमाग और मेरे दिल दोनों में दिसम्बर 19 , 1959 को 8.30 बजे शाम को जब मैं विश्वविद्यालय के द्वितीय वर्ष में था , आपस में रिश्ता बना – मैं ईसाई बन गया।

उस रात मैंने प्रार्थना की कि उन चार चीजों के साथ ईसामसीह का एक रिश्ता बने जिन्होंने मेरे जीवन को पूरी तरह बदल दिया था। पहला ,“ मैंने कहा , प्रभु य़ीशु , सूली पर मेरे लिए मरने के लिए धन्यवाद ” दूसरा , मैंने कहा , “ मैं उन चीजों को स्वीकार करता हूँ जो मेरे जीवन में है और जो आपको पसंद नहीं है और आपसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझे क्षमा करें और साफ करें। ” तीसरा , मैंने कहा , “इसी समय से “ कैसे का ” , जो मुझे सबसे अच्छा तरीका मालूम है मैं अपने ह्रदय और जीवन का द्वार खोलता हूँ और आपको अपना प्रभु और रक्षक स्वीकार करता हूँ। मेरे जीवन को अपने नियंत्रण में लीजिए। मुझे अंदर से बाहर तक बदल दीजिए। मुझे वैसा मनुष्य बना दीजिए जैसा आप रचना करते समय मुझे बनाना चाहते थे। ” अंतिम चीज जिसकी मैंने प्रार्थना की , “ विश्वास के साथ मेरे जीवन में आने के लिए धन्यवाद।” यह अज्ञानता पर नहीं बल्कि विश्वास पर आधारित था। इसका सबूत इतिहास में था और ये ईश्वर के शब्द थे।

मेरा दृढ़ निश्चय है कि आपने बहुत से धार्मिक लोगों को बिजली चमकने की तरह हुए अपने अनुभवों के बारे में बात करते हुए सुना होगा। मेरे प्रार्थना करने के बाद कुछ नहीं हुआ। मेरा मतलब है कुछ नहीं। अभी भी मेरे पंख नहीं निकले। सच बात तो यह है , यह फैसला करने के बाद मेरी हालत और भी बदतर हो गई। शाब्दिक रूप से मुझे लगा कि मुझे उल्टी आ जाएगी। ओह ! नहीं , मैंने सोचा , अब मैं किसमें फँस गया हूँ ? वास्तव में मुझे ऐसा लगा कि मैं जीवन के अंतिम छोर तक चला गया हूँ ( मुझे विश्वास है , कुछ लोगों को लगा होगा कि मैं चला गया हूँ ! )

ईश्वर और जीवन में बदलाव , सकारात्मक बदलाव

छः महीनों से लेकर डेढ़ साल में , मुझे पता चला कि मैं जीवन के गहरे अन्तिम छोर पर नहीं पहुँचा था। मेरा जीवन बदल चुका था। एक बार मैं मिडवेस्टर्न विश्वविद्यालय में इतिहास के मुख्य प्राध्यापक के साथ विवाद कर रहा था और मैंने कहा कि मेरा जीवन बदल गया है। उसने मुझे टोका और कहा , “मैक्डुवेल , तुम हमें बताना चाहते हो कि ईश्वर ने सच में इस बीसवीं सदी में तुम्हारा जीवन बदल दिया है ? किस क्षेत्र में ? 45 मिनट के बाद उसने कहा , “ ठीक है , इतना काफी है। ” कुछ चीजें जो मैंने उस दिन उसे और दर्शकों को कही थीं , वे चीजें आप मुझे आपलोगों को भी बताने दें।

पर छः महीनों से लेकर डेढ़ साल में , मुझे पता चला कि मैं जीवन के गहरे अन्तिम छोर पर नहीं पहुँचा था। मेरा जीवन बदल चुका था।

एक स्थान जिसमें ईश्वर ने बदलाव किया , वह थी मेरी विचलित दशा। मुझे हमेशा अपने आप को व्यस्त रखना था। जब मैं कैंपस में घूमता था तो मेरा दिमाग एक तूफानी हवा की तरह काम करता था जिसमें विचारों का संघर्ष दीवार से टकरा कर उठता गिरता रहता था। मैं बैठ जाता था और पढ़ने की कोशिश करता था , पर मैं पढ़ नहीं पाता था। जब मैंने ईसामसीह का फैसला लिया था , उसके कुछ महीनों के बाद मुझमें एक तरह की मानसिक शांति विकसित हुई। मुझे गलत मत समझिएगा। मैं संघर्ष के अनुपस्थित रहने की बात नहीं कर रहा हूँ। मैंने ईसामसीह के साथ रिश्ते में पाया कि संघर्ष अनुपस्थित नहीं था परन्तु उसे काबू में करने की क्षमता मुझमें आ गई थी। मैं संसार की किसी भी चीज के साथ उसका व्यापार नहीं करूँगा।

दूसरा क्षेत्र जिसमें बदलाव आया वह था मेरा बुरा स्वभाव। यदि कोई मुझे टेढ़ी आँखों से देखता था तो मैं उसकी धज्जियाँ उड़ा देता था। जब मैं कॉलेज के प्रथम वर्ष में था तब मैंने एक आदमी को शायद मार ही डाला था और उसके घाव के निशान आज भी है। मेरा गुस्सा मेरा ऐसा हिस्सा था जिसे मैंने चेतन अवस्था में कभी बदलने की कोशिश नहीं की। अभी संकटकाल में जब मुझे गुस्सा आनेवाला था , तब मुझे पता चला कि मेरा गुस्सा गायब हो गया है। इन 14 सालों में केवल एक बार मैं गुस्से से फट पड़ा था। ( जब मुझे उस समय गुस्सा आया तो उसका भुगतान मैंने लगभग छः साल किया )

घृणा में सकारात्मक बदलाव

एक और क्षेत्र है जिसपर मुझे गर्व नहीं है। पर मैंने इसका उल्लेख इसलिए किया है क्योंकि बहुत से लोगों को अपने जीवन में यही बदलाव चाहिए। इस बदलाव का उद्गम मैं जानता हूँ : ईसामसीह के साथ एक रिश्ता। वह क्षेत्र घृणा है। मेरे जीवन में भी बहुत घृणा थी। यह ऐसी नहीं थी जो कि बाहर से दिखाई देती , पर वह एक तरह की आंतरिक पिसाई थी। मैं लोगों से , चीजों से , मुद्दों से घृणा करता था।

पर संसार में सब चीजों से ज्यादा मैं एक आदमी से घृणा करता था। वह मेरे पिता थे। मैं उनकी हिम्मत से घृणा करता था। मेरे लिए वह शहर के शराबी थे। मेरे दोस्त मेरे पिता का मजाक उड़ाते थे कि मेरे पिता शहर के चारों तरफ चक्कर लगाते हैं। वे यह नहीं सोचते थे कि यह सब मुझे परेशान करता है। मैं दूसरे लोगों की तरह था – बाहर से हँसता था। पर आप मुझे बताने दीजिए। मेरा अंतर रोता था। बहुत बार जब मैं बाहर खलिहान में जाता था तो मैं देखता था कि मेरी माँ को इतनी बुरी तरह पीटा गया था कि वह उठ भी नहीं सकती थी। वह गायों के गोबर में पीछे पड़ी मिलती। जब हमारे दोस्त चले जाते , मैं अपने पिता को बाहर ले जाता , उन्हें खलिहान में बाँध देता और गाड़ी को साइलो के पास खड़ी कर देता। हम अपने दोस्तों से कहते कि उन्हें कहीं बाहर जाना था। मैं नहीं सोचता कि कोई किसी से इतनी घृणा करता होगा जितनी मैं अपने पिता से करता था।

जब मैंने ईसामसीह के लिए यह फैसला लिया , तब वह मेरे जीवन में आए और उनका प्यार इतना मजबूत था कि उन्होंने घृणा को निकालकर उसे ऊपर से नीचे कर दिया। अब मैं अपने पिता की आँखों में देखकर उनसे कह सकता था , “ डैड मैं आपसे प्यार करता हूँ ” और वास्तव में मैं यह दिल से कह रहा था। उसके बाद कुछ चीजें जो मैंने कीं , उन चीजों ने उन्हें हिला कर रख दिया।

जब मैंने ईसामसीह के लिए यह फैसला लिया , तब वह मेरे जीवन में आए और उनका प्यार इतना मजबूत था कि उन्होंने घृणा को निकालकर उसे ऊपर से नीचे कर दिया।

जब मेरा तबादला एक प्राइवेट विश्वविद्यालय में हुआ तब मैं एक मोटर दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हुआ। मेरे गले को संकर्षण पर लगाकर मुझे घर लाया गय़ा। मैं कभी भूल नहीं सकता कि मेरे पिता मेरे कमरे में आए। उन्होंने मुझसे पूछा , “ बेटे , तुम मेरे जैसे पिता से कैसे प्यार कर सकते हो ? ” मैंने कहा “ डैड , छः महीने पहले मैं आपसे घृणा करता था। ” फिर मैंने अपने पिता को बताया कि किस तरह से मैं ईसामसीह के बारे में एक निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ: “ डैड , मैंने ईसामसीह को अपने जीवन में आने के लिए कहा। मैं पूरी तरह से उसे वर्णित नहीं कर सकता , पर उस रिश्ते के परिणामस्वरूप मुझमें प्यार करने और केवल आपको ही नहीं बल्कि दूसरे लोगों को भी जैसे वे हैं उस रूप में स्वीकार करने की क्षमता आ गई है। ”

45 मिनट के बाद मुझे मेरे जीवन की सबसे बड़ी खुशी मिली। मेरे परिवार में से कोई , जो मुझे बहुत अच्छी तरह से जानता था , उसने मुझसे कहा , “ बेटे अगर ईश्वर मेरे जीवन में भी वैसा ही कर सके जैसा कि मैंने उसे तुम्हारे जीवन में करते हुए देखा है , तो मैं उसे एक मौका देना चाहता हूँ। ” उसी समय मेरे पिता ने मेरे साथ प्रार्थना की और ईसामसीह पर अपने पापों की क्षमा के लिए विश्वास किया।

ज्यादातर बदलाव कई दिनों , सप्ताहों , महीनों और कई बार एक साल के बाद दिखाई देता है। मेरे पिता का जीवन उसी समय मेरी आंखों के सामने बदल गया। ये ऐसा था जैसे किसी ने नीचे जाकर प्रकाश के बल्ब को जला दिया हो। मैंने इतनी जल्दी बदलाव आज तक या पहले कभी नहीं देखा। मेरे पिता ने व्हिस्की उसके बाद केवल एक बार छूई। वे बस उसे अपने होठों तक ले गए और बस उसके बाद नहीं। मैं केवल एक निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ। ईसामसीह के साथ रिश्ता जीवन को बदल देता है।

जीवन में बदलाव , सकारात्मक बदलाव

आप ईसाई धर्म पर हँस सकते हैं। आप उसका मजाक उड़ा सकते हैं और उसे दिखावटी कह सकते हैं पर यह काम करता है। यह जीवन को बदल देता है। अगर आप ईसामसीह पर विश्वास करते हैं , तो अपनी मनोवृत्तियों पर और कार्यों पर ध्यान दीजिए क्योंकि ईसामसीह जीवन के बदलाव के व्यवसाय में हैं।

पर ईसाई धर्म ऐसा नहीं है जिसे आप जबरदस्ती किसी के गले मढ़ें। मैं केवल यह कर सकता हूँ कि आपको बताऊँ जो मैंने सीखा है। उसके बाद , यह आपका निर्णय है। हो सकता है जो प्रार्थना मैंने की वह आपकी मदद करे : “ प्रभु यीशु , मुझे आपकी जरूरत है। मेरे लिए सूली पर मरने के लिए धन्यवाद। मुझे माफ कीजिए और मुझे स्वच्छ कीजिए। इसी क्षण से मैं आप पर अपने प्रभु और रक्षक के रूप में विश्वास करता हूँ। मुझे वैसा मनुष्य बनाइए जैसा आप मेरी रचना करके मुझे बनाना चाहते थे। ईसामसीह के नाम पर आमीन। ”

 मैंने यीशु को मेरे जीवन में आने के लिए कहा (कुछ उपयोगी जानकारी इस प्रकार है) ...
 मैंने अपने जीवन में यीशु पूछना चाहते हो सकता है, और पूरी तरह से यह समझाने कृपया ...
 मेरा एक सवाल है ...

जोश मैक्डुवेल एक जाने माने अन्तर्राष्ट्रीय वक्ता , लेखक , ईसामसीह के धर्मयुद्ध के लिए कैंपस में घूमनेवाले प्रतिनिधि हैं। उन्होंने पचास से ज्यादा पुस्तकें लिखी हैं , जिसके अन्तर्गत श्रेष्ठ पुस्तक , “ मोर दैन ए कारपेंटर ऐण्ड इविडेन्स दैट डिमान्ड्स ए वरडिक्ट ” भी आती है।

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