जीवन और परमेश्वर के बारे में सवालों का पता लगाने के लिए एक सुरक्षित जगह
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जीवन में मेरा उद्देश्य क्या है ?

एक बार जब आप अपना उद्देश्य जान लेते हैं तो जीवन में और भी ज्यादा अर्थ भर जाता है।

एक हथौड़े पर विचार कीजिए। कीलों पर प्रहार करने के लिए ही उसका खाका तैयार किया गया। यही करने के लिए उसकी रचना की गई। अब कल्पना कीजिए कि हथौड़े का कभी प्रयोग नहीं हुआ। वह औजार बॉक्स में ही रखा रहा। हथौड़े ने भी इसकी परवाह नहीं की।

पर अब कल्पना कीजिए कि उसी हथौड़े की अपनी एक आत्मा है, आत्मजागरूकता है। औजारबॉक्स में रहते हुए दिन बीतते जाते हैं। अंदर हथौड़े को अजीब सा महसूस होता है, पर उसे समझ में नहीं आता क्यों? कुछ है जो अनुपस्थित है, पर उसे नहीं पता वह क्या है ?

फिर एक दिन कोई उसे खींचकर औजार बॉक्स से बाहर निकालता है और उसका प्रयोग आग रखने के स्थान के लिए कुछ शाखाओं पर प्रहार करने के लिए करता है। हथौड़ा खुशी से पागल हो जाता है। उसे पकड़ा गया, ताकत लगाई गई और शाखाओं पर प्रहार किया गया - हथौड़े को बहुत अच्छा लगा। पर दिन के समाप्त होने पर , उसमें फिर भी असंतोष था। शाखाओं पर प्रहार करने में उसे मजा आया, पर वही सबकुछ नहीं था। कुछ फिर भी अनुपस्थित था।

बाकी जो दिन आते गए, उसमें बहुत बार उसे प्रयोग में लाया गया। उसने हबकैंप का नया ढाँचा गढ़ा, चट्टान की नई परत में विस्फोट किया, एक मेज के पाए पर प्रहार करके उसे अपने स्थान पर लगाया। फिर भी वह असंतुष्ट और अपूर्ण था। अतः वह ज्यादा से ज्यादा कार्य करना चाहता था। अपने चारों तरफ की चीजों पर प्रहार करने के लिए, उन्हें तोड़ने के लिए, विस्फोट करने के लिए, चीजों पर पैबन्द लगाने के लिए वह ज्यादा से ज्यादा प्रयोग में लाया जाना चाहता था। उसे लगता था कि ये सभी घटनाएँ उसे संतुष्ट करने के लिए काफी नहीं थी। उसे विश्वास था कि उन सबका ज्यादा मात्रा में होना ही उसकी संतुष्टि का कारण होगा।

फिर एक दिन किसी ने उसका प्रयोग कील के साथ किया। अचानक, उस हथौड़े की आत्मा प्रकाशित हो गई। अब उसकी समझ में आया कि वास्तव में कौन सा काम करने के लिए उसे बनाया गया है। उसका मुख्य काम कीलों पर प्रहार करना था। उसने अब तक जितनी भी चीजों पर प्रहार किया था वे सभी इसकी तुलना में फीकी थीं। अब वह हथौड़ा जान गया था कि इतने दिनों से उसकी आत्मा क्या ढूँढ़ रही थी।

-हमें ईश्वर की छवि में रचा गया है ताकि हम उसके साथ एक रिश्ता बना सकें। उस रिश्ते में रहना ही हमारी आत्मा की संतुष्टि का एकमात्र कारण हो सकता है। ईश्वर को जानने के पहले हमें कई आश्चर्यजनक अनुभव होते हैं, पर हमने उस समय तक कील पर प्रहार नही किया होता है। हमारा प्रयोग किसी नेक उद्देश्य के लिए किया गया होता है, पर उसके लिए नहीं जिसके लिए हमें रचा गया है और जिससे हमें पूरी संतुष्टि और पूर्णता प्राप्त होगी। ऑगस्टाइन ने इसे संक्षेप में इस तरह कहा है, “आपने (ईश्वर) हमें अपने लिए रचा है और हमारा ह्रदय तब तक अशांत रहता है जब तक वह आपकी शरण में आराम न ले ले।”

परमेश्वर के साथ रिश्ता ही एकमात्र रास्ता है जो हमारी आत्मा की प्यास को बुझा सकता है। यीशु ने कहा, “ मैं जीवन की रोटी हूँ। जो मेरे पास आएगा वह कभी भूखा नहीं रहेगा और जो मेरे ऊपर विश्वास करेगा वह कभी प्यासा नहीं रहेगा। ” जब तक हम ईश्वर को नहीं जानते तब तक हम जीवन में भूखे और प्यासे रहते हैं। हम सभी तरह की चीजों को “ खाने ” और “ पीने ” का प्रयास करते हैं ताकि हमारी भूख और प्यास मिट सके, पर फिर भी वह वैसी ही रहती है।

हम हथौड़े की तरह हैं। हमें पता नहीं चलता है कि हमारा खालीपन कैसे खत्म होगा ? हमारे जीवन में संतुष्टि और पूर्णता की कमी कैसे पूरी होगी ? यहाँ तक कि नाजी शिविर के बीच कोरी टेन बूम को ईश्वर पूर्ण संतुष्टि देनेवाले लगे, “ हमारी खुशी की नींव वह है जिसे हम खुद जानते हैं और जो यीशु के साथ ईश्वर में छिपी है। हमें ईश्वर के प्रेम पर विश्वास रखना चाहिए ------ हमारी चट्टान जो कि घोर अंधकार से ज्यादा मजबूत है।“

ज्यादातर जब हम ईश्वर को दूर रखते हैं और हम संतुष्टि और पूर्णता ईश्वर को छोड़कर किसी और वस्तु में खोजते हैं तब वह हमें पूरी नहीं मिलती। हम ज्यादा से ज्यादा “ खाते ” और “ पीते ” हैं और गलत सोचते हैं कि हमारी समस्या का हल “ ज्यादा ” में है। पर हम कभी भी अंत में संतुष्ट नहीं हो पाते हैं। हमारी सबसे बड़ी इच्छा ईश्वर को जानने में, उसके साथ रिश्ता बनाने में है। क्यों ? क्योंकि हमें उसी तरह बनाया गया है। क्या आपने अभी तक कील पर प्रहार किया है ?

 मेरा एक सवाल है ...
 परमेश्वर के साथ एक रिश्ता शुरू कैसे किया जाए
दूसरों केसाथ बाँटिए  

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