जीवन और परमेश्वर के बारे में सवालों का पता लगाने के लिए एक सुरक्षित जगह
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समलैंगिक पुरुष, समलैंगिक स्त्री – क्या परमेश्वर आपको प्यार करते हैं ?

बहुत से समलैंगिक पुरुषों और समलैंगिक स्त्रियों को यह संदेश मिलता है कि ईश्वर उनसे घृणा करते हैं। देखिए यह सच क्यों नहीं है ?

मेरिलिन एडमसन द्वारा

जीवन हमसे कुछ खास योग्यताएँ चाहता है। एक चालक को लाइसेंस प्राप्त करने के लिए एक परीक्षा में उत्तीर्ण होना पड़ता है। एक खास नौकरी पाने के लिए आपको यह दिखाना पड़ता है कि उस नौकरी को पाने के लिए आप में उसके अनुरूप योग्यता मौजूद है।

अगर “ अ ” है तो “ ब ” सिद्ध कीजिए कि आप “ योग्य ” हैं। सिद्ध कीजिए कि आप “ स्वीकार्य ” हैं।

किस बिन्दु पर आप जान सकते हैं कि ईश्वर आपको स्वीकार करता है ?

आपने जिस किसी भी चीज का सामना किया है, उसके विपरीत ईश्वर के साथ आपका रिश्ता ऐसे खाली स्थान भरने से शुरू नहीं होता, “मुझे स्वीकार कीजिए क्योंकि - - -”

वह ईश्वर के यह कहने पर शुरू होता है, “मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ। ” “ मैं तुम्हारा स्वागत करता हूँ। ”

चाहे आप समलैंगिक पुरुष हों, समलैंगिक स्त्री हों, उभयलिंगी, विपरीतलिंगी हों या आपके अनेक प्रश्न हों, ईश्वर हमारा शत्रु नहीं है। यदि आपने अभी तक ईश्वर के साथ कोई रिश्ता कायम नहीं किया है तो ईश्वर आपके साथ एक रिश्ता बनाना चाहते हैं। वह यह प्रस्ताव सबों को देते हैं।

इंजील में आप देखेंगे कि एक समूह ने लगातार ईसामसीह को क्रोधित किया - - - धार्मिक आत्मधर्मी।

ईसामसीह को बाकी सबों के साथ ,यहाँ तक कि वैश्याओं और अपराधियों के साथ भी कोई समस्या नहीं थी, हालांकि धार्मिक कुलीनवर्ग ने उन्हें कुपित और दुखी किया। ईसामसीह ने देखा कि वे निर्णायक, अभिमानी, प्रेमरहित और पाखंडी थे।

आप उन शब्दों को देखेंगे और तुरंत उन धार्मिक लोगों के बारे में सोचेंगे जो कि हानिकारक, अशिष्ट और आपके प्रति निर्णायक थे। क्या यह ईसा, के ह्रदय का प्रतिनिधित्व करतेँ है। नहीं, ईसामसीह ने कहा कि आप अपने पड़ोसी से उसी तरह प्यार कीजिए जैसा कि आप स्वयं से करते हैं। हानिकारक टिप्पणियाँ किस तरह इसके अनुकूल है ? किसी भी तरह नहीं।

यही ईसामसीह का ह्रदय प्रकट करता है। उन्होंने कहा, “ हे सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो; और मुझ से सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूं: और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे।”1

क्या आपको कभी भी ईसामसीह के बारे में गंभीरता से सोचने का मौका मिला है –

दूसरे जीवित लोगों के विपरीत , ईसा जीवन के बारे में आपको बताते हैं - - किस प्रकार प्रचुर मात्रा में जीवन का अनुभव किया जाए, जिन चीजों का अस्तित्व है वह उन सबका रचयिता है, फिर भी वह मनुष्य के रूप में आया ताकि हम उसे जान सकें, ईश्वर को पहचान सकें।

यूहन्ना, ईसामसीह का एक मित्र जिसने ईसामसीह के बारे में टिप्पणी की है, “क्योंकि उस की परिपूर्णता से हम सब ने प्राप्त किया अर्थात अनुग्रह पर अनुग्रह। इसलिये कि व्यवस्था तो मूसा के द्वारा दी गई; परन्तु अनुग्रह, और सच्चाई यीशु मसीह के द्वारा पहुंची।” 2

“अनुग्रह” ऐसा शब्द नहीं है जिसका हम बहुत प्रयोग करते हैं। इसका अर्थ है -- ईश्वर की दयालुता जो कि हमें मिली है वह हमें बिना कमाई के मिली है। इसमें ईसा अपनी दयालुता और सच्चाई दोनों का प्रस्ताव हमारे सामने रखते हैं ताकि इस भ्रमित जीवन में हमें मार्ग दिखा सकें।

मैं यह सोचकर विस्मित था कि ईश्वर द्वारा स्वीकार किए जानेपर कैसा लगेगा ? शायद आप भी मेरी तरह ही अचरज करेंगे। यहाँ देखिए –

“ क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए। परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिये नहीं भेजा, कि जगत पर दंड की आज्ञा दे परन्तु इसलिये कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए। जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती, परन्तु जो उस पर विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहर चुका; इसलिये कि उस ने परमेश्वर के एकलौते पुत्र के नाम पर विश्वास नहीं किया।”3

क्या आपने मेरे इस संदेश को समझा ? जो भी उनपर विश्वास करता है उसे अनंत जीवन प्राप्त होता है, वह उनके द्वारा बचाया जाता है और वह दंडित नहीं होता ।

ईसा हमसे यही करने को कहते हैं – उनपर विश्वास कीजिए।

य़ूहन्ना ने ईसा के बारे में कहा, “ वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया। परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें, जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।” 4

वह केवल एक पैगम्बर, शिक्षक या धार्मिक गुरू नहीं थे। ईसा ने कहा कि उन्हें जानना ईश्वर को जानने के बराबर है। उनपर विश्वास करना ईश्वर पर विश्वास करने के बराबर है। उनका यह कहना ही उन्हें शूली पर ले गया। लोगों ने उनपर निन्दा का आरोप लगाया। लोगों ने कहा, “ परमेश्वर को अपना पिता कह कर, अपने आप को परमेश्वर के तुल्य ठहराता था॥”5

उन्होंने इसके प्रमाण दिए। ईसा ने तुरंत वह किया जो कोई भी मनुष्य नहीं कर सकता था। उन्होंने उसी समय अंधे, लंगडे और जो बीमारी से लड़ रहे थे उन्हे ठीक किया।

इसके बाद ईसा इससे भी परे गए। कई अवसरों पर उन्होंने कहा कि उन्हे पकडा जाएगा, मारा जाएगा और शूली पर चढ़ाया जाएगा - - - - और तीन दिन के बाद वे पुनर्जीवित होंगे। यह एक ठोस सबूत है। बाद में उनका कोई अवतार नहीं हुआ, वे रहस्यमय नहीं रहे। उन्होंने कहा, आप मुझे सपनों में देखेंगे। दफनाने के तीन दिन बाद वे फिर से पुनर्जीवित हुए।

रोमानियों को इसके बारे में पता था इसलिए उन्होंने ईसामसीह की कब्र पर सैनिकों की टुकड़ी का पहरा बैठा दिया।

ईसामसीह तीन दिन तक यंत्रणा पाने और शूली पर मारे जाने के बाद भी शारीरिक रूप में कब्र से बाहर आए। उनका शरीर जा चुका था। केवल वही कपड़े बाकी थे जिन्हें पहनाकर उन्हे दफनाया गया था। 40 दिनों के अन्तराल में ईसामसीह खुद शारीरिक रूप से कई बार दिखे। इसी तरह ईसाइयों का विश्वास जगा। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि वे वही हैं जिसका वे दावा कर रहे थे - - - हाड़ माँस के शरीर में ईश्वर, ईश्वर के समान जो कि सबका पिता है।

ईसा इस विषय में अत्यन्त स्पष्ट थे, “ पिता किसी का न्याय भी नहीं करता, परन्तु न्याय करने का सब काम पुत्र को सौंप दिया है। इसलिये कि सब लोग जैसे पिता का आदर करते हैं वैसे ही पुत्र का भी आदर करें: जो पुत्र का आदर नहीं करता, वह पिता का जिस ने उसे भेजा है, आदर नहीं करता। मैं तुम से सच सच कहता हूं, जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजने वाले की प्रतीति करता है, अनन्त जीवन उसका है, और उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती परन्तु वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।”6

आपको आश्चर्य होगा, ये सही है कि अनन्त जीवन महान है। पर अभी के लिए इस जीवन में क्या

आप यह जानते हुए यह जीवन व्यतीत कर सकते हैं कि ईश्वर आपसे प्रेम करता है।

सबमें प्यार पाने की भूख होती है। मनुष्य का प्रेम महत्त्वपूर्ण होता है फिर भी जो मनुष्य आपसे प्रेम करता है उसका प्रेम अपूर्ण होता है क्योंकि मानव अपूर्ण होते हैं। परन्तु ईश्वर आपसे पूर्ण रूप से प्रेम कर सकते हैं। वे हमें प्यार करते हैं क्योंकि प्यार करना उनके स्वभाव में ही है। यह न तो कभी बदलता है और न ही कभी रुकता है।

हम सब कुछ गड़बड़ कर देते हैं। हम जीवन जीने के अपने मापदंड पर ही खरे नहीं उतर पाते, ईश्वर के मापदंड की तो छोड़िए। पर ईश्वर हमें हमारे कार्यों के अनुसार स्वीकार नहीं करता। वह हमें स्वीकार करता है जब हम उसपर विश्वास करते हैं, उसके पास जाते हैं, उसे अपने जीवन में आने के लिए आमंत्रित करते हैं।

ईसामसीह ने निम्नांकित तरीके से उनके साथ रिश्ता रखने की बात की है :

“पिता किसी का न्याय भी नहीं करता, परन्तु न्याय करने का सब काम पुत्र को सौंप दिया है। इसलिये कि सब लोग जैसे पिता का आदर करते हैं वैसे ही पुत्र का भी आदर करें: जो पुत्र का आदर नहीं करता, वह पिता का जिस ने उसे भेजा है, आदर नहीं करता। मैं तुम से सच सच कहता हूं, जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजने वाले की प्रतीति करता है, अनन्त जीवन उसका है, और उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती परन्तु वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।”7

अगर आप उनकी बात मानते हैं तो क्या ? अगर आप ईश्वर के साथ एक रिश्ता शुरू करते हैं तब क्या होता है ?

कोई खास रिश्ता जो कि आपके जीवन में था उसका प्रभाव आज भी आप पर है, हो सकता है वह सकारात्मक हो या हो सकता है वह नकारात्मक हो। ऐसा सबके साथ होता है। रिश्ता जितना ज्यादा मजबूत होता है सका प्रभाव भी उतना ही ज्यादा होता है। अतः इस तथ्य में वजन है कि ईश्वर को जानने से एक महत्त्वपूर्ण रिश्ता बनेगा जो आपके जीवन को उनके प्रेम और उनकी इच्छाओं के अनुरूप एक दिशा देगा। आप अपना निर्णय स्वयं लेंगे। आप अपनी मर्जी के अनुरूप रहेंगे। वह आपके जीवन पर अपना नियंत्रण नहीं करेगा और न ही वह जैसा चाहता है उसके अनुरूप आपसे काम करवाएगा। फिर भी मैंने अपने आप को उसकी बुद्धिमता, दयालुता और जिस प्रकार ईश्वर लोगों को और उनके जीवन को देखता है, उससे प्रभावित पाया।

ईश्वर समाज के हुक्म के अनुसार हमें संकेत नहीं देता है। ईश्वर जिसने इस संसार की रचना की, उसे क्या समाज के निर्देशन की जरूरत है ? मुझे यह पसंद आया। मुझे इसमें मुक्ति का अनुभव होता है।

जब मैंने ईश्वर के साथ एक रिश्ता कायम किया, ईश्वर ने मेरे जीवन में क्या किया ?

मैं एक नास्तिक था। ईश्वर पर विश्वास करना, उसके बारे में बाइबल पढ़ना मेरे जीवन का बहुत बड़ा बदलाव था। वास्तव में यह चिरस्मरणीय था।

ईसामसीह को अपने जीवन में शामिल करने के कुछ महीनों बाद मेरी जिगरी दोस्त ने मुझसे पूछा, क्या तुमने अपने जीवन में कोई परिवर्तन महसूस किया है और मैंने कहा, तुम्हारा क्या मतलब है उसने कहा, अब मैं तुम्हे अपनी बातों का हिस्सा बना सकती हूँ और तुम मेरा मजाक नहीं उड़ाते हो। ऐसा लगता है कि तुम ध्यान से मेरी बात सुन रहे हो।

यह सुनकर मैं शर्मिंदा हुआ। मेरी सबसे जिगरी दोस्त मुझसे कह रही थी कि आखिरकार मैं एक सभ्य इंसान की तरह पेश आने लगा और उसकी बात सुनने लगा। मेरे जीवन के बदलाव को महसूस करके वह इतनी हैरान हुई कि उसने भी ईसामसीह को अपने जीवन में शामिल करने का फैसला ले लिया।

यहाँ वह दिया गया है जो मैं सोचता हूँ कि मेरे जीवन में हो रहा है।

जब मैंने ईश्वर से रिश्ता शुरू किया तब मैं अपने लिए ईश्वर के प्यार के प्रति अत्यंत जागरूक हो गया। मुझे वास्तव में बड़ा आश्चर्य हुआ। जिन चीजों के बारे में मैं बाइबल में पढ़ता था वे मेरे लिए ईश्वर का निजी संदेश बन गईं कि वे मुझसे कितना प्यार करते हैं। ( उनकी बनाई गई असमानताओं को देखकर मुझे यह लगता था कि वे मुझसे नाराज हैं पर यह मेरे लिए अचंभे की बात थी कि वे मुझसे प्यार करते हैं।)

मुझे लगता है कि प्रेम के लिए मेरी संवेगात्मक जरूरत ईश्वर द्वारा गहरे स्तर पर इस तरह पूरी की गई है कि मैं संवेगात्मक स्तर पर अपने आप को पूरी तरह सुरक्षित समझने लगा हूँ। मैं ज्यादा सोचने लगा हूँ, मैं अपने अलावा दूसरों की ज्यादा परवाह करने लगा हूँ। जाहिर है मैं एक अच्छा श्रोता और परवाह करनेवाला मनुष्य बन गया हूँ। मुझे यह भी लगता है कि मैं जिस नस्लीय कट्टरता में पला बड़ा हूँ वह भी धीरे – धीरे कम हो रही है।

ईसामसीह हमसे वादा करते हैं कि जैसे – जैसे हम उन्हें सिखाने और मार्ग प्रदर्शन करने देंगे,वे कहते हैं, “और सत्य को जानोगे, और सत्य तुम्हें स्वतंत्र करेगा।”8

अगर आप ईसा के साथ एक रिश्ता शुरू करेंगे तो आप अपनी मनोवृत्तियों में, आशावादिता में, दूसरों को देखने के तरीके में, आप अपना समय किस प्रकार व्यतीत करते हैं उसमें परिवर्तन देखेंगे। यह केवल ईश्वर जानता है। पर जैसे – जैसे आप उसे जानेंगे आपका जीवन उससे प्रभावित होता जाएगा। जो ईसा का अनुसरण करते हैं उनसे पूछिए, वे आपको बताएंगे कि किस तरह ईसा को जानने से उनका जीवन प्रभावित हुआ।

वह हममें उसके बताए रास्ते को चुनने की प्रबल इच्छा जागृत करता है। वह ऐसा कैसे करता है यह अप्रत्याशित है। ऐसा नहीं है कि वह आपको नए आदेश देता है जिसे आपको मानना ही है। यह खुद का प्रयास नहीं है और ऐसा भी नहीं है कि आप परमेश्वर के लिए काम कर रहे हैं। यह धार्मिक निष्ठा भी नहीं है। यह एक रिश्ता है, ईश्वर के साथ एक अंतरंग मित्रता है। यह परमेश्वर हैं जो व्यक्तिगत रूप से आपका नेतृत्व कर रहा है और आपको अपने बारे में, जीवन के बारे में सिखा रहा है। परमेश्वर हमारे जीवन में तभी प्रवेश करता है जब हम उसे अपने जीवन में आने के लिए आमंत्रित करते हैं। वह हमारे जीवन को भीतर से, दिल के स्तर पर प्रभावित करता है।

ईसा आपको जीवन की पूर्णता देते हैं। आप जानते हैं किस तरह रिश्ते, नौकरी, खेल, मनोरंजन ----- सभी महान क्षण हैं, फिर भी उसकी पूर्णता लगता है कहीं भागी जा रही है। उससे मिला हुआ संतोष हमें पूर्णता प्रदान नहीं करता है। इस धरती का कुछ भी हमें वह पूर्णता प्रदान नहीं कर सकता है।

हमें निरंतर उसकी भूख रहती है जो विश्वसनीय है तथा हमेशा स्थायी रहता है। यीशु ने उन से कहा, “जीवन की रोटी मैं हूं: जो मेरे पास आएगा वह कभी भूखा न होगा और जो मुझ पर विश्वास करेगा, वह कभी प्यासा न होगा।” उन्होंने अपना यह वाक्य यह कहकर पूरा किया,“जो कुछ पिता मुझे देता है वह सब मेरे पास आएगा, उसे मैं कभी न निकालूंगा।”9 मैंने कई सालों तक जीवन के दर्शन को खोजा जो किसी भी परिस्थिति में हमेशा काम करे। परमेश्वर को जानने के बाद मेरी वह खोज समाप्त हो गई। मुझे वह विश्वास करने के योग्य लगे।

उसके साथ आपका रिश्ता आपको किसी और के साथ उनके ऱिश्ते से बिल्कुल अलग लगेगा। आप एक ऐसे व्यक्ति होंगे जिसका अनुभव, विचार, शौक, सपने, जरूरतें सभी अद्वितीय होंगे। इंजील को पढ़िए और आप ईसा को लोगो से, लोगों के रूप में संबंधित देखेंगे।

मैं इस बिन्दु पर चिन्तित हूँ कि मैं आपको परमेश्वर को जानने के केवल फायदे बता रहा हूँ।

ईश्वर से रिश्ता इस बात की गारंटी नहीं देता कि आप जीवन की कठिनाइयों से बच जाएँगे। हो सकता है कि आपको वित्तीय तनाव, भयानक बीमारी, दुर्घटना, भूकंप, रिश्ते में दिल को चोट पहुँचे आदि।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि जीवन में कई तरह के दुख हैं। या तो आप उसे अकेले झेलें या फिर आप इस बात से निश्चिंत रहें कि ईश्वर का प्रेम, उसका साथ और निकटता दुख के क्षण में हमारे साथ है।

दूसरी ध्यान रखनेवाली बात यह है कि हो सकता है ईश्वर आपको किसी खास चुनौतीपूर्ण व्यवसाय में ले जाए, जिसमें दूसरों का ध्यान रखने के लिए हो सकता है आपको स्वयं का बलिदान देना पड़े।

ईसा के ज्यादातर शिष्यों ( और उनके अनुयायियों को आज) अत्यधिक दुखों से गुजरना पड़ा है। उदाहरणस्वरूप – पॉल को कई बार पकड़ा गया, अनगिनत बार बेंत और कोड़ों से पीटा गया। एक बार तो क्रोधित भीड़ ने उसे पत्थरों से इतना मारा कि वह मरते – मरते बचा। बहुत बार उसका जहाज टूट गया, बहुत दिन वह बिना खाने के रहा, बहुत बार अपने जीवन की रक्षा के लिए उसे इधर - उधर भागना पड़ा।

स्पष्टतः ईसा के अनुयायियों का जीवन आसान नहीं था। फिर भी पॉल और उनके दूसरे माननेवाले इससे भयभीत नहीं हुए क्योंकि उन्हें अपने प्रति परमेश्वर के प्रेम पर विश्वास था।

पॉल लिखता है, “ परन्तु इन सब बातों में हम उसके द्वारा जिस ने हम से प्रेम किया है, जयवन्त से भी बढ़कर हैं। क्योंकि मैं निश्चय जानता हूं, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएं, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ, न ऊंचाई, न गहराई और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी॥”10

आप अपने जीवन की योजना मत बनाइए । चाहे आप समलैंगिक पुरुष हों, समलैंगिक स्त्री हों, उभयलिंगी, विपरीतलिंगी हों या आपके अनेक प्रश्न हों - - यदि आप उसे करने दें, ईसा आपके जीवन को निर्देशित करेंगे और वह आपकी कल्पना से कहीं ज्यादा बड़ा होगा। ईसा ने कहा, “जगत की ज्योति मैं हूं; जो मेरे पीछे हो लेगा, वह अन्धकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा।” 11

आप इसी समय ईश्वर से एक रिश्ता कैसे शुरू कर सकते हैं,यह यहाँ दिया जा रहा है।

आपने अपने जीवन में जो कुछ भी किया है, ईसामसीह आपको पूर्ण क्षमा प्रदान करते हैं।हमारे पापों को केवल अनदेखा ही नहीं किया गया बल्कि ईसा ने हमारी जगह शूली पर अपने प्राण देकर उसकी कीमत चुकाई है।

क्या आपके लिए कभी किसी ने बलिदान दिया है यह केवल ईसा ने परम स्तर पर जाकर किया है। वह आपको इतना प्यार करता है। वह आपके दिल में जाकर आपसे एक रिश्ता बनाना चाहता है।

क्या आप परमेश्वर को जानना चाहते हैं ? अगर आपने अब तक परमेश्वर को नहीं बुलाया है तो मैं आपको प्रोत्साहित करता हूँ कि आप उसे अपने जीवन में आने को कहें। वह कहते हैं कि यही रिश्ता हमें तृप्त करता है। उसके बिना इस जीवन में आगे बढ़ने का कोई अर्थ नहीं है।

आप जिन शब्दों का इस्तेमाल करना चाहते हैं उनके द्वारा आप उससे बात कर सकते हैं। अगर आप को मदद की जरूरत है, तो यहाँ शब्द दिए गए हैं जो आप कह सकते हैं –

“ईसामसीह, मैं आप पर विश्वास करता हूँ। मेरे पापों के लिए शूली पर चढ़ने के लिए और अपने साथ रिश्ता कायम करने का मौका देने के लिए धन्यवाद। मैं चाहता हूँ कि आप मेरे जीवन के ईश्वर बनें, मैं आपको जानना चाहता हूँ. आपके प्रेम का अनुभव करना चाहता हूँ और इसी समय से मैं आपको मेरे जीवन का नेतृत्व करने के लिए कहता हूँ। ”

 मैंने यीशु को मेरे जीवन में आने के लिए कहा (कुछ उपयोगी जानकारी इस प्रकार है) ...
 मैंने अपने जीवन में यीशु पूछना चाहते हो सकता है, और पूरी तरह से यह समझाने कृपया ...
 मेरा एक सवाल है ...

(1) मत्ती 11:28-29 (2) यूहन्ना 1:16,17 (3) यूहन्ना 3:16-18 (4) यूहन्ना 1:11,12 (5) यूहन्ना 5:18 (6) यूहन्ना 5:22-24 (7) यूहन्ना 15:9-12 (8) यूहन्ना 8:32 (9) यूहन्ना 6:35,37 (10) रोमियो 8:37-39 (11) यूहन्ना 8:12

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