जीवन और परमेश्वर के बारे में सवालों का पता लगाने के लिए एक सुरक्षित जगह
जीवन और परमेश्वर के बारे में सवालों का पता लगाने के लिए एक सुरक्षित जगह
पसन्द  
साझा करें  

अस्थाई संसार में मानसिक शांति

भविष्य में क्या होनेवाला है , इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। चिन्तित और परेशान होने की अपेक्षा मानसिक शांति बनाए रखना संभव है।

संसार में क्या हो रहा है या हमारे व्यक्तिगत जीवन में क्या हो रहा है उससे कोई मतलब नहीं है , पर क्या कोई ऐसी जगह है जिन पर हम स्थिरता प्राप्त करने के लिए आश्रित हो सकते हैं ? जीवन और संसार की परिस्थितियों से बेपरवाह होकर क्या हम भविष्य की ओर आशा से देख सकते हैं। आजकल बहुत से छात्र अचलता के लिए ईश्वर के महत्व को समझ रहे हैं। हमारे चारों तरफ का संसार निरंतर बदलता रहता है किन्तु ईश्वर में परिवर्तन नहीं होता। वह स्थिर , हमेशा एक जैसा और विश्वसनीय रहता है। वह कहता है ,“ क्या मुझे छोड़ कोई और परमेश्वर है ? नहीं, मुझे छोड़ कोई चट्टान नहीं; मैं किसी और को नहीं जानता॥ क्योंकि मैं यहोवा बदलता नहीं ” 1 ईश्वर हमेशा से है। उस पर निर्भर रहा जा सकता है। वह , “ यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एकसा है। ”2 वह हमें अपने द्वारा मानसिक शांति देकर और हमारे मन को सुरक्षित आराम देकर खुद से हमारी पहचान करवाता है।

क्या मानसिक शांति बनाए रखना संभव है ?

स्टैनफॉर्ड से आज के पढ़े हुए एक स्नातक हीथर , ने इसे इस प्रकार बतलाया है , “ वास्तविक जीवन में ईश्वर के साथ रिश्ता एक चौंका देनेवाला और एक सुंदर दैनिक सत्य है। यह एक ब्रह्मांडीय साहचर्य है जिसका व्यापार मैं संसार के साथ नहीं कर सकता। मुझे जिस प्रकार से गहराई से पहचाना और प्यार किया गया है कि मैं आशा करता हूँ कि मैं परस्पर वार्तालाप कर सकूँगा। ”

छात्र स्टीव सौयर को अधिक रक्तस्त्राव था। उसने स्थायित्व की तरफ देखा जब उसे पता चला कि गंदा खून चढ़ाने के कारण उसे एच. आई. वी. हो गया है। स्टीव बहुत परेशान था। उसने इसके लिए ईश्वर पर दोष लगाया। उसके बाद वह ईश्वर के पास गया। उसका परिणाम -- स्टीव ने ( भयंकर दर्द को सहते हुए ) अपने सहपाठी छात्रों को यह बताने के लिए अनगिनत कॉलेज के कैंपस में भ्रमण किया कि किस प्रकार वे ईश्वर को जान सकते हैं और शांति का अनुभव कर सकते हैं , जो उसने ईश्वर को जानने के बाद अनुभव किया है। परमेश्वर ने कहा , “मैं तुम्हें शान्ति दिए जाता हूं , अपनी शान्ति तुम्हें देता हूं ; जैसे संसार देता है , मैं तुम्हें नहीं देता: तुम्हारा मन न घबराए और न डरे। संसार में तुम्हें क्लेश होता है, परन्तु ढाढ़स बांधो, मैं ने संसार को जीत लिया है। ” 3

स्टीव की तरह , दूसरे छात्रों ने भी यह जाना कि इस जीवन में चाहे जो कुछ भी हो जाए , यह संसार का अंत नहीं है ” – क्योंकि यह संसार अंत नहीं है।

गहरी खाई के ईश्वर

-यह मानना होगा कि जब तक समय वास्तव में काफी कठिन न हो जाए , तबतक कई लोग ईश्वर की ओर मुड़ने का इंतजार करते हैं। एक मिलिट्री चैपलेन , जो कि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय था उसने बताया , कोई भी नास्तिक गहरी खाई में नहीं है। जब तक जीवन फूलों की तरह सुगंधित है , लोगों को नहीं लगता कि उन्हें ईश्वर की जरूरत है। पर जब चीजें गड़बड़ होने लगती हैं तब लोगों का ख्याल बदल जाता है। उन्हें एहसास होता है कि वे खाई में गिर गए हैं।

कैरीन , वरजीनिया की एक छात्रा ईश्वर की ओर जानेवाले अपने रास्ते के बारे में इस तरह बताती है , “ मैंने सोचा मैं ईसाई हूँ क्योंकि मैं हर रविवार को चर्च में जाती थी। पर मेरा इसके बारे में कोई मत नहीं था कि ईश्वर कौन हैं। हाई स्कूल का मेरा वरिष्ठ वर्ष पहले तीन सालों जैसा ही था। मैं अपना ज्यादातर समय शराब पीने में या ऐसा रास्ता खोजने में व्यतीत करती थी जिससे मैं किसी का प्यार पा सकूँ। मैं अंदर ही अंदर मर रही थी और मेरे जीवन पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं था। इस बात का एहसास मुझे तब हुआ जब मैं चाहती थी कि मेरा जीवन समाप्त हो जाए। जब मैं कॉलेज में गई तो मुझे लगा कि मुझे आशा को खोजना होगा। यही वह समय था जब मैंने ईश्वर को अपने जीवन में आने के लिए कहा। परमेश्वर ने मुझे प्यार , सुरक्षा , क्षमा , सहारा , ढाढ़स , स्वीकारना और जीने का एक उद्देश्य समझाया। यही मेरी शक्ति है। यदि यह सब उनके लिए नहीं होता तो आज मैं यहाँ नहीं होती। ”

किसे पता है भविष्य में क्या होनेवाला है ? बहुत से छात्रों को ऐसा लग सकता है कि वे एक गहरी खाई में हैं। जीवन एक युद्धक्षेत्र है। हमारे मन की शांति पूरी तरह से डाँवाडोल हो सकती है। उन क्षणों में जब सबकुछ अशांत लगता है तो हमलोग बहुधा ईश्वर की तरफ मुड़ते हैं। ठीक है , क्योंकि ईश्वर , जो कि नित्य है , वहाँ है और वास्तव में चाहता है कि वह हमारे जीवन में शामिल हो। वह कहता है ,“ मैं ही यहोवा हूं और मुझे छोड़ कोई उद्धारकर्ता नहीं। तुम मेरी ओर फिरो और उद्धार पाओ! क्योंकि मैं ही ईश्वर हूं और दूसरा कोई नहीं है।” 4

जी हाँ , ईश्वर को “ बैसाखी ” समझा जा सकता है। पर शायद यही सही है कि वही वास्तव में वैध है।

अदृश्य गहरी खाइयाँ

जब सभी चीजें सही दिशा में जा रही होती हैं तब भी कई लोग ईश्वर की तरफ मुड़ते हैं। जॉन जो कि टेक्सस का एक छात्र है , ने बताया , “ मेरे अंतिम वर्ष तक , मैंने वह सब कुछ प्राप्त कर लिया जो लोग कहते थे कि वह मुझे संपूर्ण बनाएगा – कैंपस की संस्था में नेतृत्व की भूमिका , पार्टी में जाना , अच्छे दर्जे प्राप्त करना , लड़कियों के साथ डेटिंग करना आदि। इन सबसे मैं काफी प्रभावित था। सभी कुछ जो मैं करना चाहता था और पाना चाहता था जब मैं कॉलेज में था , मैंने किया। वह सब बीत गया, फिर भी मैं अपने आप को अपूर्ण महसूस करता था। कहीं कुछ कमी थी और मेरे पास आने जाने की कोई जगह नहीं थी। यह किसी को पता नहीं था कि मैं जीवन के विषय में क्या सोच रहा हूँ – बाहर से मैं किसी को कुछ बताता या दिखाता नहीं था। ”

जब जीवन में सभी चीजें सही दिखती हैं फिर भी जीवन हमें एक गहरी खाई दिखलाता है – एक आन्तरिक गहरी खाई जो कि खुली आँखों से हमें दिखाई नहीं देता पर दिल से उसे महसूस किया जा सकता है। बेकी , जो कि इलीनोइस का एक छात्र है , वह इस घटना को इस तरह वर्णित करता है : आपने कितनी बार सोचा है कि अगर आपके पास कपड़े का वह टुकड़ा होता या वह लड़का आपका दोस्त होता या आप किसी जगह पर जाते तो आपका जीवन सुखी और संपूर्ण होता। कितनी बार आपने वह शर्ट खरीदी या उस लड़के के साथ जो कि आप का मित्र है , डेट पर गए या उस जगह पर घूमने गए और वहाँ से और ज्यादा खालीपन लेकर लौटे जहाँ से आपने शुरुआत की थी।

हमें गहरी खाई को महसूस करने के लिए असफलता या त्रासदी की जरूरत नहीं है। ज्यादातर शांति की कमी हमारे जीवन में तब आती है जब हमारे जीवन में ईश्वर की अनुपस्थिति रहती है। ईश्वर को जानने के बाद बेकी कहते हैं , “ उस समय से मैंने बहुत संघर्ष किया और मेरे जीवन में बहुत सा परिवर्तन आया। अब मैं जो कुछ भी करता हूँ अब उसे एक नए परिप्रेक्ष्य के साथ देखता हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि मुझे प्यार करनेवाला , शाश्वत ईश्वर मेरे साथ है। मुझे विश्वास है कि ऐसा कुछ भी नहीं है जो ईश्वर और मैं साथ मिलकर संभाल नहीं सकते – और जिस संपूर्णता को मैं बहुत कठिनाई से ढूँढ़ रहा था अंत में वह मुझे मिल ही गई। ”

जब ईश्वर हमारे जीवन में शामिल रहते हैं तब हम आसानी से आराम कर सकते हैं। जैसे - जैसे हम ईश्वर को जानने लगते हैं और जो कुछ उसने हमें बाइबल में बताया है उसे सुनते हैं , वह हमारे जीवन में मन की शांति लाता है क्योंकि हम उसे जान लेते हैं। हम जीवन को उसकी सहूलियत के हिसाब से देखते हैं। हम उसकी वफादारी से और हमारी देखभाल करने की उसकी योग्यता से परिचित रहते हैं। अतः भविष्य में क्या होनेवाला है हमें उसकी चिन्ता नहीं रहती है क्योंकि हम अपनी आशाएँ नित्य ईश्वर पर स्थिर कर देते हैं।अगर हम उसकी तरफ मुड़ते हैं और उसे ढूँढ़ते हैं तो वह भी हमारे जीवन में अपने आप को सिद्ध करने की चेष्टा करता है।

मन की सच्ची शांति – चट्टान पर निर्मित करना

क्या आप अपने जीवन में किसी चीज पर कुछ निर्मित कर रहे हैं ? आप विश्वास कीजिए या नहीं , हर मनुष्य किसी चीज पर कुछ निर्मित करता है। हम सबकी एक नींव है , जिस पर हमारी आशा और विश्वास टिका है। हो सकता है वह खुद हमारे में हो। मैं जानता हूँ अगर मैं कठिन प्रयास करूँगा तो मैं अपने जीवन को सफल बना सकूँगा या जीवन जीने का तरीका – अगर मैं काफी पैसा कमाऊँगा तो जीवन बहुत अद्भुत होगा या शायद समय की सीमा – भविष्य चीजों को बदल देगा। ईश्वर का दृष्टिकोण अलग है। वह कहता है कि अपनी आशा और विश्वास अपने ऊपर रखना , दूसरों पर रखना या इस संसार पर रखना एक अस्थिर जमीन पर पैर रखने के समान है। इसके बदले ईश्वर चाहता है कि हम उसके ऊपर विश्वास करें। वह कहता है ,“ इसलिये जो कोई मेरी ये बातें सुनकर उन्हें मानता है वह उस बुद्धिमान मनुष्य की नाईं ठहरेगा जिस ने अपना घर चट्टान पर बनाया। मेंह बरसा और बाढ़ें आईं, और आन्धियां चलीं, और उस घर पर टक्करें लगीं, परन्तु वह नहीं गिरा, क्योंकि उस की नेव चट्टान पर डाली गई थी।

-परन्तु जो कोई मेरी ये बातें सुनता है और उन पर नहीं चलता वह उस निर्बुद्धि मनुष्य की नाईं ठहरेगा जिसने अपना घर बालू पर बनाया और मेंह बरसा, और बाढ़ें आईं, और आन्धियां चलीं, और उस घर पर टक्करें लगीं और वह गिरकर सत्यानाश हो गया॥” 5

जब आपदाएँ आती हैं , उस समय ईश्वर को अपने जीवन में शामिल करना बुद्धिमानी है। पर ईश्वर का इरादा हमें प्रचुर मात्रा में जीवन देने का है , भले ही परिस्थितियाँ कैसी भी हों। वह हमारे जीवन के हर क्षेत्र में अपना सकारात्मक प्रभाव दिखाना चाहता है। जब हम उस पर और उसके शब्दों पर भरोसा करते हैं तब हम अपने आप को चट्टान पर निर्मित करते हैं।

मन की परम शांति

कुछ लोग अरबपतियों की संतान होने पर अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं या यह जानने में कि वे आराम से अच्छा दर्जा प्राप्त कर सकते हैं। पर इससे भी बड़ी सुरक्षा ईश्वर के साथ एक रिश्ता बनाने में है।

ईश्वर शक्तिशाली है। हमारे विपरीत ईश्वर जानता है कि कल , अगले सप्ताह , अगले साल , अगले दशक में क्या होनेवाला है। वह कहता है , “ मैं ही परमेश्वर हूं और मेरे तुल्य कोई भी नहीं है। मैं तो अन्त की बात आदि से और प्राचीनकाल से उस बात को बताता आया हूं। ” 6 वह जानता है कि भविष्य में क्या होनेवाला है। सबसे मुख्य बात यह है कि वह जानता है कि आपके जीवन में क्या घटनेवाला है और वह चाहता है कि जब वह घटे तब वह उस समय आपके साथ हो। यह तभी हो सकता है जब आपने उसे अपने जीवन में शामिल करने का निश्चय कर लिया हो। वह कहता है , वह हमारा शरणस्थान और बल है, संकट में अति सहज से मिलने वाला सहायक। ” 7 पर हमें उसे खोजने का एक सच्चा प्रयास करना होगा। वह कहता है , “ तुम मुझे ढूंढ़ोगे और पाओगे भी; क्योंकि तुम अपने सम्पूर्ण मन से मेरे पास आओगे। ” 8

इसका यह मतलब नहीं है कि जो ईश्वर को जानते हैं वे कठिन समय से नहीं गुजरते। उन्हें भी गुजरना पड़ता है। यदि हमारे राष्ट्र को आतंकवादियों के आक्रमण का सामना करना पड़ता है , वातावरण संबंधी या आर्थिक विपदाएँ आती हैं तो जो लोग ईश्वर को जानते हैं उन्हें भी इन संकटों से गुजरना पड़ता है। पर ईश्वर की उपस्थिति उन्हें एक प्रकार की शक्ति और शांति प्रदान करती है। ईसामसीह के एक अनुयायी ने इसे इस प्रकार बताया है , “ हम चारों ओर से क्लेश तो भोगते हैं, पर संकट में नहीं पड़ते; निरूपाय तो हैं, पर निराश नहीं होते। सताए तो जाते हैं; पर त्यागे नहीं जाते; गिराए तो जाते हैं, पर नाश नहीं होते।” 9 वास्तविकता बताती है कि हम समस्याओं का सामना कर सकते हैं। पर यदि हम ईश्वर के साथ एक रिश्ता बनाते हैं तो हम उन समस्याओं का सामना एक अलग तरह के परिप्रेक्ष्य और शक्ति के साथ कर सकते हैं जो कि हमारी अपनी नहीं है। ईश्वर की क्षमता के सामने दुर्गमता कोई बड़ी समस्या नहीं है। कोई भी समस्या जो हम पर आती है ईश्वर उन सबसे बड़ा है और वह उनका सामना करने के लिए हमें कभी अकेला नहीं छोड़ता है।

ईश्वर परवाह करता है। ईश्वर की अथाह शक्ति के साथ – साथ उसका असीम प्रेम भी हमारे जीवन में दिखाई पड़ता है। भविष्य में हो सकता है कि पूरे विश्व में एक ऐसी शांति हो जो कि पहले कभी दिखाई नहीं पड़ी हो या हो सकता है कि एक दूसरे के लिए जातीय घृणा और हिंसा हो , तलाक आदि ज्यादा हो। दोनों ही परिस्थितियों में हमें कोई उतना प्यार नहीं करेगा जितना कि ईश्वर करेगा। उसके शब्द बताते हैं , “ यहोवा भला है; संकट के दिन में वह दृढ़ गढ़ ठहरता है, और अपने शरणागतों की सुधी रखता है।” 10 और ,“ अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उस को तुम्हारा ध्यान है। ”11 और “ यहोवा अपनी सब गति में धर्मी और अपने सब कामों में करूणामय है। जितने यहोवा को पुकारते हैं, अर्थात जितने उसको सच्चाई से पुकारते हें; उन सभों के वह निकट रहता है। वह अपने डरवैयों की इच्छा पूरी करता है, ओर उनकी दोहाई सुन कर उनका उद्धार करता है। ” 12

ईसामसीह ने अपने अनुयायियों से ये सांत्वना देनेवाले शब्द कहे , “ क्या पैसे मे दो गौरैये नहीं बिकतीं? तो भी तुम्हारे पिता की इच्छा के बिना उन में से एक भी भूमि पर नहीं गिर सकती। तुम्हारे सिर के बाल भी सब गिने हुए हैं इसलिये , डरो नहीं ; तुम बहुत गौरैयों से बढ़कर हो। ” 13 यदि आप ईश्वर की ओर अपना ध्यान लगाते हैं तो वह आपकी देखभाल इस तरह करता है जैसी और कोई नहीं करता और वैसी दूसरा और कोई कर भी नहीं सकता है।

ईश्वर के द्वारा मन की शांति

हमें थोड़ा भी आभास नहीं है कि हमारे भविष्य में क्या होनेवाला है ? यदि कठिन समय होगा तो ईश्वर हमारे साथ होंगे। यदि सामान्य या सरल समय होगा तभी भी हमें ईश्वर की जरूरत होगी ताकि हमारे अंदर जो खालीपन है वे उसको भर सकें और हमारे जीवन को एक अर्थ दे सकें।

सब कुछ कहे और करे जाने के बाद सबसे महत्वपूर्ण क्या है ? सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हम ईश्वर से अलग न हों। क्या हम ईश्वर को जानते हैं ? क्या वह हमें जानता है ? क्या हम उसे अपने जीवन से निकाल सकते हैं या क्या हम उसे अपने जीवन में ला सकते हैं ? उसे जानने के कारण वह हमें एक परिवर्तित दृष्टिकोण और आशा देता है। उसके साथ रिश्ता रखने पर सभी तरह की परिस्थितियों में हम शांति से रह सकते हैं।

-ईश्वर हमारे जीवन का केन्द्र क्यों है ? वह इसलिए है क्योंकि उसे जाने बिना कहीं भी शांति या आशा नहीं है। वह ईश्वर है , हम नहीं। वह हमारे ऊपर आश्रित नहीं है , पर हमें उसपर आश्रित रहना ही पड़ता है। उसने हमारी रचना की है ताकि हमें अपने जीवन में उसकी उपस्थिति की आवश्यकता हो। हम अपने जीवन को उसके बिना जीने की कोशिश कर सकते हैं पर वह निरर्थक होगा।

ईश्वर चाहता है कि हम उसे ढूँढ़े। वह चाहता है कि हम उसे जाने और उसे अपने जीवन में शामिल करें। पर एक समस्या है : हम उसे बाहर निकाल देते हैं। बाइबल इसे इस प्रकार वर्णित करती है , “ हम तो सब के सब भेड़ों की नाईं भटक गए थे; हम में से हर एक ने अपना अपना मार्ग लिया ” 14 हम सबने अपने जीवन को ईश्वर के बिना चलाने की कोशिश की। इसे ही बाइबल में “ पाप ” कहते हैं।

हीथर , जिसने पहले भी उद्धरण दिया है , पाप के बारे में कहते हैं , जब मैं स्टैनफोर्ड में आया , मैं ईसाई नहीं था। दुनिया क्रांतिकारी परिवर्तन के इंतजार में मेरे कदमों में थी। मैंने राजनीतिक बैठकों में भाग लिया , जातिवाद और सामाजिक न्याय के ऊपर कक्षाएँ आयोजित की और अपने आपको सामुदायिक सेवा में लिप्त कर लिया। मुझे अपनी आंतरिक शक्ति पर भरोसा धा जिसके द्वारा मैं इस संसार में एक महत्वपूर्ण अंतर ला सकूँ। मैंने बेहतर जीवन से वंचित प्राथमिक स्कूल के बच्चों को पढ़ाया एक बेघर आश्रय में एक दिवा शिविर चलाया , भूखों को खिलाने के लिए बचा हुआ खाना जमा किया। फिर भी , मैं जितना संसार को बदलने की कोशिश करता उतना ही ज्यादा निराश हो जाता। मैंने नौकरशाही , उदासीनता और पाप का सामना किया। मैं सोचने लगा कि मानव के स्वभाव को एक बुनियादी कायापलट चाहिए।

मन की शांति = ईश्वर के साथ शांति

चीजों की भव्य योजना में बदलते समय और तकनीक में सुधार का बहुत ज्यादा मतलब नहीं है। क्यों ? वह इसलिए , क्योंकि मनुष्य होने के कारण हमारी मुख्य समस्या है कि हमने अपने आपको ईश्वर से बहुत दूर कर लिया है। हमारी बड़ी समस्याएँ शारीरिक नहीं हैं बल्कि आध्यात्मिक हैं। ईश्वर यह जानता है। अतः उसने उससे इस अलगाव का एक समाधान हमें दिया है। उसने हमारे लिए एक रास्ता बनाया है जिससे हम उसके पास वापस पहुँच सकें -- वह है ईसामसीह के द्वारा।

बाइबल कहती है , “ क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए। ”15 ईसामसीह को हमारे पापों के लिए हमारी जगह सूली पर चढ़ाया गया। ( मृत्यु का एक प्राचीन तरीका ) वह मर गए , उन्हें दफनाया गया , मृत्यु के बाद वे फिर से जिन्दा हुए। हमारे लिए बलिदान देनेवाली उनकी मृत्यु के कारण हमारा ईश्वर के साथ एक रिश्ता बना -- “ परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं। ” 16

यह वास्तव में बहुत आसान है : ईश्वर हमारे साथ एक उत्तम रिश्ता चाहता है। अतः उसने उस रिश्ते को ईसामसीह के द्वारा संभव बनाया। अब यह हमारे ऊपर है कि हम ईश्वर को खोजें और उसे अपने जीवन में लाएँ। ज्यादातर लोग यह प्रार्थना के द्वारा करते हैं। प्रार्थना का अर्थ है सच्चाई के साथ ईश्वर के साथ बात करना। ईश्वर से कुछ इस तरह कहकर आप इसी समय ईश्वर तक पहुँच सकते हैं। प्रभु मैं आपको जानना चाहता हूँ। अबतक मैंने आपको अपने जीवन में शामिल नहीं किया है , पर मैं अब उसे बदलना चाहता हूँ। आपसे अलगाव को दूर करने के आपके द्वारा दिए गए सुझाव का मैं लाभ उठाना चाहता हूँ। मैं , मेरे कारण हुई ईसामसीह की मृत्यु पर भरोसा करता हूँ ताकि मुझे क्षमा प्राप्त हो और मैं सच्चा बन सकूँ। मैं चाहता हूँ कि आप इसी दिन से मेरे जीवन में शामिल हों।

क्या आपने ईमानदारी से ईश्वर को अपने जीवन में शामिल होने को कहा है ? यह केवल आप और वह जानते हैं। अगर आपने ईमानदारी से कहा है तो आपके सामने देखने के लिए बहुत कुछ है। “वे जीवन पाएं, और बहुतायत से पाएं।” 17 “ उसके साथ वास करेंगे।” 18 “ अनन्त जीवन तुम्हारा है। ” 19

मेलिसा , न्यू इंगलैण्ड की एक छात्रा , ईश्वर के बारे में कहती है , जब मैं बहुत छोटी थी तब मेरी मां ने मेरे पिता को तलाक दे दिया था। मुझे निश्चित रूप से पता नहीं था कि क्या चल रहा था। मुझे केवल यह पता था कि मेरे पिता अब घर नहीं आते थे। एक बार मैं अपनी नानी से मिलने गई और मैंने उनसे कहा कि मेरी समझ में नहीं आता कि मेरे पिता मुझे दुखी करके क्यों गायब हो गए। उसने मुझे गले से लगाया और कहा कि कोई है जो तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ेगा। वह और कोई नहीं है , ईसामसीह हैं। उसने उद्धरण सुनाया , इब्रानियो 13:8 और भजन संहिता 68:5 जो ये कहते हैं , मैं कभी नहीं जाऊँगा , तुम्हे कभी नहीं त्यागूँगा और जिनके पिता नहीं हैं मैं उनका पिता बनूँगा। मैं यह सुनकर बहुत उत्साहित हुई कि ईश्वर मेरे पिता बनना चाहते हैं।

कोई बात नहीं , संसार में आपके चारों तरफ कुछ भी हो रहा हो , आपके मन में यह जानकर शांति होगी कि ईश्वर आपकी सहायता करने के लिए आपके साथ वहाँ है। भविष्य में क्या होनेवाला है इसकी परवाह करे बिना ईश्वर आपके साथ हमेशा रहेगा।

 मैंने यीशु को मेरे जीवन में आने के लिए कहा (कुछ उपयोगी जानकारी इस प्रकार है) ...
 मैंने अपने जीवन में यीशु पूछना चाहते हो सकता है, और पूरी तरह से यह समझाने कृपया ...
 मेरा एक सवाल है ...

(1) बाइबल में यशायाह 44 : 8 और मलाकी 3 : 6 (2) इब्रानियो 13 : 8 (3) यूहन्ना 14 : 27 और 16 : 33 (4) यशायाह 43 : 11 और यशायाह 45 : 22 (5) मत्ती 7 : 24 – 27 (6) यशायाह 46 : 9 -10 (7) भजन संहिता 46 : 1 (8) यिर्मयाह 29 : 13 (9) 2 कुरीन्थियों 4 : 8 – 9 (10) नहूम 1 : 7 (11) 1 पतरस 5 : 7 (12) भजन संहिता 145 : 17 – 19 (13) मत्ती 10 : 29 – 31 (14) यशायाह 53 : 6 a (15) यूहन्ना 3 : 16 (16) यूहन्ना 1 : 12 (17) यूहन्ना 10 : 10 (18) यूहन्ना 14 : 23 (19) 1 यूहन्ना 5 : 11 - 13

दूसरों केसाथ बाँटिए  

TOP